तुम मुझे झूठ कहते हो मैं मान लेती हूँ 
गलत कहते हो चलो वो भी सही हो 
झुका देते हो मुझे हद से ज्यादा 
झुक जाती हूँ स्व को मिटा कर 
रुला देते हो रो लेती हूँ जी भर कर 

तुम डांटते हो मैं हंस कर टाल देती हूँ 
तुम चीखते हो चिल्लाते हो मैं चुप हो जाती हूँ 
तुम नजर अंदाज करते हो 
मैं और ज्यादा फिक्रमंद हो जाती हूँ 
मिलती है गर इन सबसे तुम्हारे अहम को तुष्टि 
तो क्या मैं इतना भी नहीं कर सकती तुम्हारे लिए 
सुनो प्रिय मैं तो प्रेम करती हूँ न तुमसे कोई खेल तो नहीं 
यह दिल की बाते हैं सनम और तुम ही समझोगे इन्हें
कोई और तो नहीं न !!

सीमा

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