रिया तू मुस्करा

दिल भरता नहीं, आँखें रजती नहीं चाहें कितनी भी देर प्रिय तुम्हें देखती रहूँ फिर भी मन करता है कि बस तुम्हारी तस्वीर को यूं ही बैठी देखती रहूँ !सुनो प्रिय जब तुमने मुझे अपने प्रेम भरे स्पर्श से छुआ था वो प्यारी छुअन मेरे मन में बसी हुई है ...जब तुमने मुझसे प्रेम से बातें की थी उन सबकी महक हवाओं में रजनी गंधा के फूलों की खुशबू सी महक रही है ...जहां जहां हम मिले उन गली रस्तों पर फूलों ने अपना बसेरा कर लिया है ...वे इस इंतजार में हैं कि हमारे आने तक यूं ही खिले रहें ...सुनो प्रिय, मेरा दिल न जाने क्यों तुम्हें इतना याद कर रहा है ? न जाने क्यों आँख नम कर रहा है ? न जाने क्यों तुम्हें गले लागने को आतुर हो रहा है .?..क्यों तुम्हारी याद मुझे बेचैन कर रही है ? प्रिय मैं तुमसे उस क्षितिज पर मिलना चाहती हूँ जहां पर देवता भी हमारे मिलन पर खुशी के गीत गाने लगते हैं ! आकाश नूर बरसाने लगता है और ब्रह्मांड खुशी के गीतो पर झूमने लगता है ....ओ मेरे प्रिय देव मंदिर में बजते शंख, घंटे की मधुर धुन के बीच होती पवित्र आरती की तरह हमारे मिलन की राह वो प्रकृति भी देख रही है ....ओ देव मैं
प्रेम के गहन सागर में डूबी, दुनियाँ से बेखबर होकर लिख रही हूँ प्रेम की एक नई इबारत अपनी आँखों में कि शायद तुम पढ़ सको उनमें झांक कर .....प्रिय किसी दिव्य दोहे की तरह मेरी नस नस तुम्हें यादों में रट रही है बार बार दोहरा रही हैं बिना किसी व्यवधान के ......प्रिय एक बार मेरी आँखों की इस नमी में देखो जहां सिर्फ तुम्हारी छवि है ....दिल में उतार कर देखो जहां सिर्फ तुम हो ,,,मेरा मन जहां चलती रहती हैं तुमसे ही अनवरत बातें ....और वे स्वप्न जिन पर सिर्फ तुम्हारा ही अधिकार है तो फिर ये कैसी याद है जो तुमसे मिलने को मचल उठी है .......

दिल मिन्नतें करे ! आजा आजा तू प्रिय !! अब जीना हुआ मुहाल ......
क्रमशः 
सीमा असीम

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