गतांक से आगे 

रिया तू मुस्कुरा 







तुम मेरी जरूरत नहीं हो, न ही तुमसे कोई दरकार है, न ही तुम मेरा ख्वाब हो और न ही ख़्वाहिश हो ! वो कहते हैं न .....यह तो प्रेम की बात है उद्धो .......शायद तुम समझते हो इसे, तभी तो कुछ भी कहते रहते हो, करते रहते हो और मैं बिना कुछ प्रतिवाद के सब स्वीकार लेती हूँ और भी ज्यादा डूब जाती हूँ हर तरह से .....अच्छा ही है न .....खुश जो देखना चाहती हूँ तुम्हें और मैं हो जाती हूँ उससे भी ज्यादा खुश ......सुनो प्रिय कभी कभार तुम भी तो आहत हो जाते होगे, मुझे आहत करके, हैं न ? 
लेकिन सुनो, मैंने तो खुद को अब इंद्र्धनुषी रंग में रंग लिया है जो सात रंगों मे रंगा होने के बाद भी रंगहीन होता है मतलब सफेद, चमकता हुआ अपनी किरणों से हर तरफ रंग बिखेरता हुआ ....बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा,पीला,नारंगी लाल !!!
बिन रंग के होकर भी इतने रंगों से रंगी मैं ..... कोई रंग नहीं उतर सकता क्योंकि कर लूँगी खुद को ही सफ़ेद, बिखेर दूँगी चमक ! जब कभी जरूरत पड़ने पर ......तुम जानते हो न कि अच्छी सोच और सुंदर चरित्र के कोई भी रंग नहीं होते...  यह यूं ही  मन की  बातें नहीं हैं बल्कि यही  सच है जब तुम जीवन में या कहानियों में रंग तलाश रहे होते हो तब मैं  सफ़ेद रंग में  रंगी चमक रही होती हूँ सतरंगी रंगों से , क्योंकि मेरी  खूबसूरती  तो इसमें  ही है......। बस बहुत है सिर्फ तुम्हारा होना भर ही ,,, हमारे  आसपास और   यकीन  मानों तुम  रहते हो  यही मेरे  पास .....हमेशा .... सदा...।
क्रमशः

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