गतांक से आगे 

रिया मुस्करा

जब मन में प्रेम पलता है तो आँखों में पवित्रता उतर आती है, न जाने कैसी देवीय शक्ति मन में घर कर जाती है ! वैसे बहुत ही आसान है न, किसी से भी प्रेम हो जाना,, पर बहुत ही मुश्किल है उसे निभाना और उसमें ही जीते चले जाना ! पल भर को भी अपने प्रिय को अपने ख़यालों से दूर न जाने देना ! सुनों प्रिय, जब हल्की सी भी आहट होती है न, तो यूं लगता है मानों तुम आ गए हो! आज जब दरवाजे के पास लगी विंड चाइम ने हवा के सहारे हिलकर सुरीली धुन बिखेरी तो यूं लगा कहीं तुम ही तो नहीं हो ? कैसे अचकचा के उठ कर बाहर आई ....न जाने कैसी घबराहट कि अगर वाकई तुम ही हो तो मैं कैसे तुम्हारा स्वागत करूंगी ? ओहह आज तो मैंने अपने बाल भी नहीं सवारे ! लेंकिन तुम तो यहाँ कहीं नहीं हो ... पागल खुद को ही कहकर हल्का सा सर झटकते हुए सोचा कि तुम तो मेरे साथ ही हो फिर कैसा इंतजार ? फिर कैसी बेचैनी ? फिर कैसी तड़प ? सुनो प्रिय, यह तुम्हारा प्रेम ही तो है जो मुझे हर हाल में खुश रहना, मुसकराना सिखता है .... 

क्योंकि मैं समझ गयी हूँ कि मेरी मुस्कान, तुम्हारे लिए वरदान है ...आशीर्वाद है उस रब का ...तुम्हें और तुम्हारे ख्वाबों के लिए ....तभी तो हर समय मुस्कान अपने होठों पर रखने लगी हूँ ....एक जादुई अहसास रोम रोम में जगाए रखती हूँ ..और किसी पवित्र ग्रंथ की तरह प्रिय तुम्हारे नाम को अपनी पवित्र आत्मा से मन ही मन लेती रहती हूँ ........घने अंधेरे में भी चमकता रहता है तुम्हारा अक्स ....प्रिय यह मेरा प्रेम ही तो है जिसने मुझे जीना सिखाया है ......व्याकुल मन को धीर बंधाना सिखाया है .....और सजदे में झुकना  सिखाया है .....तभी तो बेला सा महकता रहता है मेरा तन ...
क्रमशः 
सीमा असीम

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