गतांक से आगे
रिया तू मुस्करा
उदासी का एक पौधा रोप दिया था मैंनेअपने भीतर
सीचने लगी थी उसे अपने अश्कों से
दर्द के पत्ते लहलहाने लगे थे
उसमें धीरे धीरे
एकटक एक ही दिशा में देखते हुए
ठहर गयी थी निराश आँखें
मन में अनवरत बहता हुआ मीठे पानी का झरना
सूखने लगा था
न कोई ख़्वाहिश
न ही कोई उम्मीद
दुआओं में उठे रहते थे हाथ
तुम्हारी खुशी के लिए
चुप्पी लगे होठों पर थी एक ही प्रार्थना
जो ख्वाब हैं तुम्हारे मन में
वे न रह जाये कोई भी अधूरे
मेरा क्या है मैं तो प्रेम को अकेले ही जी लूँगी
गुनती बुनती सुनती
उन प्रेमगीतों को
जो मैंने लिख डाले थे
विरह में जीते हुए
किसी शोर शराबे और
विरोध से दूर
खामोशियों तन्हाइयों में जीते हुए
मन में फैले निर्वात के साथ
अपनी आवाज कहीं नहीं फैलाना चाहती थी
लेकिन न जाने कैसे सुन ली तुमने मेरी आवाज
ना जाने कैसे पढ़ लिए मेरे लिखे प्रेम गीत
कि छू दिया आकार मुझे अहसासों में
और उदासियों के घने दरख्त पर लहलहा आए खुशियों के फूल
हम दोनों मुस्करा जो दिये थे
झरते हुए फूलों कि तरह
साथ साथ
......क्रमशः
सीमा असीम

Comments
Post a Comment