भंवर



अब जान गयी है धरा 
सब समझ गयी है धरा
ना जाने कैसे पर समझ आ गयी है 
आसमां की सच्चाई उसकी हकीकत
उसके खामोश रहने पर भी
पढ लिया है मन
हाँ सब जान और समझ गयी है धरा
वो खुद में ही डूबती चली जा रही है
तडपती मचलती झटपटाती भंवर में फंसी धरा
भूल गयी है स्वयं को ही और उतरती ही जा रही है गहरे और गहरे
झुलसते हुए से उस भंवर में
उलझते सुलझते ही पा ली है अब उसने सुलझन उस उलझन से
जो चलती रहती है अनवरत उसके मन में
करती रहती है उसकी आत्मा को छलनी
वही मिल गया उसका आसमां उस भंवर के मध्य
उलझन भरे भंवर के मध्य ही फंसा है उसका आसमां
साथ है उसके उसकी धड़कन की तरह
बेखबर बेपरवाह सा साथ निभा रहा है
उस भंवर में खुद को भी उलझता चला जा रहा है
अपनी प्रिय धरा का साथ निभाने को
हर पल हर क्षण हर घडी!! 
सीमा असीम


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