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Showing posts from August, 2026
 काश एक ऐसा शब्द जो हर किसी के मन में एक बार जरूर आता है मेरी मां में आता था मैं बार-बार इस शब्द को लिखती थी काश ,?  जब एक बार तुमने इस शब्द को मेरी रचना में देखा तो तुमने कहा था एक कांच क्यों हटा दो काश उसे दिन के बाद मैं किसी भी रचना में काश लिखना छोड़ दिया था कभी लिखने का मन भी करता तो तुम्हारी बात याद आ जाती थी और मैं उसे नहीं लिखती थी, पर आज तो मेरा मन कर रहा है कि मैं  इस शब्द को लिखूं कि काश , तुमने मुझे ना कहा होता काश मत लिखो, या मैं तुम्हारी बात ना सुनी होती नहीं मानी होती तुम्हारी बात.... सीमा असीम 
 आज की बात आज मैंने फिर खुद को याद दिलाया, कि ताज सिर पर हो तो ज़िम्मेदारी भी बड़ी होती है। मैं बिना मेहनत के कुछ नहीं चाहती। जो मिलेगा, अपनी लगन से मिलेगा। थकूँगी, पर रुकूँगी नहीं। मैं सिर्फ़ एक नाम नहीं, मैं एक कोशिश हूँ, जो हर दिन बेहतर हो रही है। • सीमा
उसका झूठ झूठ भी कितना सच्चा बोला था उसने, कि हमने सच को भी झूठ मान लिया। कहता था — तुम सी हो, तुम्हारे बिना मर जाऊँगा। आज देखो, हमारे बिना भी जी रहा है, और हम उसी झूठ पर आज भी जी रहे हैं। उसके झूठ में भी एक अदा थी, सच से ज्यादा मीठी सदा थी। हम लुट गए उस सदा पर, और वो जीत गया अपनी अदा पर। अब किसी के सच पर भी यकीन नहीं आता, जब से उसका झूठ सबसे हसीन लगा था।
है खुद पर यकीन इतना कि खुद के लिए, आसमान से तारे खुद ही तोड़ लाऊंगी एक दिन। ना किसी के इंतज़ार में आँसू बहाऊँगी, अपनी रोशनी खुद ही बन जाऊँगी एक दिन। जो छोड़ा था मुझे अंधेरे में अकेला, उसे दिखा दूँगी, मैं सूरज बन जाऊँगी एक दिन।
बेवफा प्रेम तुमने कहा था साथ निभाओगे, राह कोई भी हो, चल जाओगे। हमने तुम्हारे लफ्ज़ों को खुदा माना, और तुमने उसी खुदा को भुला दिया। वादा था चाँद-तारों जैसा, निभाना था उम्र भर वैसा। पर तुम तो चाँद निकले, जो हर रात जगह बदल लेते हैं। हम आज भी उसी मोड़ पर हैं, जहाँ तुमने हाथ छोड़ा था। फर्क बस इतना है, अब हम रोते नहीं, मुस्कुराकर याद करते हैं। बेवफा तुम नहीं, तुम्हारा वक्त था, जो हमारे प्यार से बड़ा हो गया। और हम? हम आज भी वही हैं... तुम्हारे उस "हमेशा" का इंतजार करते हुए। सीमा असीम  23,8,26
 1. प्रेम प्रेम में बड़ा कुछ नहीं होता, प्रेम में छोटा भी कुछ नहीं होता  बस एक बोतल पानी रख देना, बस एक गलती पर मुस्कुरा  देना, और बारिश में चुपचाप बैठे रहना... 2. तुम तुम मिले फिर मिले  दूर जाकर भी  दूर गये नहीं  एक आदत बन गयी  और यह आदत रह गई, आदत ही तो है   कभी कहीं नहीं जाती यह आदत.. सीमा  22,8,26 3उदास  आज मन उदास है तो रहने दो, हर बात को समझना ज़रूरी नहीं, कभी-कभी बस यूँ ही तुम्हारा ख्याल आना  और हमेशा रहना प्रेम ही तो है..
 तेरे नाम की रोशनी से दिल रोशन है, तेरे नाम से ही मेरी हर सुबह रोशन है। तेरे नाम लिख दी है ये ज़िंदगी, तेरे नाम से ही मेरा हर अफसाना रोशन है... सीमा असीम  १८, 8, २६ 
 दिल एक मंदिर है और तुम उसमें रहते हो, हम तो बस तुम्हारी पूजा करते हैं। तुम बसे हो साँसों में इस तरह, हर धड़कन में सिर्फ तुम ही तुम रहते हो। प्यार हमारा अमर है, ये तो तय है, हम तो हर जन्म बस तुम्हारे ही रहते हैं सीमा असीम  16,8,26
  मैं हूँ यहाँ पर, तुम हो वहाँ पर, बीच में ये सावन की दीवार है  मैं मेहंदी लगाए बैठी हूँ, तुम यादों में उलझे बैठे हो, मैं तीज गा रही हूँ, तुम किस ख्याल में बैठे हो? आ जाओ न, ये दूरी सही नहीं जाती है  मुझे तो अब ये जुदाई बहुत रुलाती है  सावन की ऋतु यूँ ही न चली जाये  तेरी याद बेतरहा मुझे सताती है.. सीमा असीम  15,8,26
 तीज का त्यौहार आया, सखी, साजन का पैगाम लाया। हरी-हरी चूड़ियाँ खनकी, मेहंदी से गोरी हथेली महकी, झूले पड़े नीम की डाली पर, गोरी झूले, गीत गाए मतवाली पर। सावन ने भी चूनर ओढ़ी, बादलों ने भी बिंदिया जोड़ी, धरती दुल्हन सी सजी है आज, देखो तीज का कितना है नाज़।
  ना याद रहा कहाँ रखा काजल, ना याद रहा किससे क्या बोला, रसोई में नमक की जगह चीनी डाल दी, और हँस कर खुद से ही बोली - ये क्या कर दिया! आईना देखूं तो तू दिखे, ख्वाब देखूं तो तू दिखे, लोग कहते हैं खोई-खोई रहती हूँ, मैं कहती हूँ - हाँ, तुम्हीं में तो खोई रहती हूँ। जबसे इश्क हुआ तुमसे, मैं मैं न रही, बस तेरी हो गयी। सीमा असीम  14,8,26
 इश्क मेरा रूहानी इश्क मेरा रूहानी है, न छूने का, न पाने का। न लिपस्टिक के रंग में है, न ज़ुल्फों के ढंग में है, ये तो उस एक नज़र में है, जो तुमने चुपके से देखी थी। ये जिस्मों का सौदा नहीं, ये दिलों का वादा नहीं, ये तो रूह से रूह के मिलने की एक सादी सी कहानी है। तुम पास हो तो सुकून है, तुम दूर हो तो भी जूनून है, इश्क मेरा रूहानी है, हर साँस में बस तू ही तू है। सीमा असीम  14,8,26
मैं प्रेम में हूँ हाँ, मैं प्रेम में हूँ, और अब मुझे सब सुंदर लगता है, हवाएँ भी गीत गाती हैं, और धूप भी मीठी लगती है। मैं प्रेम में हूँ, इसलिए आईने में खुद को ज्यादा देखती हूँ, हर बात पर मुस्कुराती हूँ, बिना वजह के। ये प्रेम ने क्या किया, दिल को इतना कोमल कर दिया, कि अब हर धड़कन बस, उसी का नाम लेती है। हाँ, मैं प्रेम में हूँ, और यही मेरे जीवित होने का, सबसे सुंदर प्रमाण है।
 यह प्यार क्यों होता है पता नहीं यह प्यार क्यों होता है, बिना पूछे, बिना बताए, बस हो जाता है। न शक्ल देख कर होता है, न नाम देख कर, ये तो बस एक एहसास है, जो दिल को छू जाता है। कभी एक बात से हो जाता है, कभी एक मुस्कान से, और कभी तो बस, किसी के होने भर से। ये प्यार क्यों होता है, इसका जवाब किसी के पास नहीं, बस इतना पता है, जब होता है, तो ज़िंदगी खूबसूरत लगने लगती है।
 चलो फिर से किशोरी बन जाते हैं, जब प्रेम का मतलब बस आँखों-आँखों में बात होती थी, एक छोटी सी चिट्ठी, और दिन भर की मुस्कान। चलो फिर से वो बचपन जीते हैं, जहाँ प्रेम में कोई हिसाब नहीं था, न कल की चिंता, बस आज में जीना था। न कोई दिखावा, न कोई दुनियादारी, बस एक सच्चा, सादा, सा पहली बारिश जैसा प्रेम। हाथ में हाथ हो या न हो, दिल में तो प्रेम है न, तो चलो, फिर से उसी मासूमियत से प्रेम करते हैं।
 किशोरी आँखों में जो एक सपना जगा था, वो आज भी इस दिल में वैसा ही सजा है। वो पहली धड़कन, वो पहली सी लकीर, समय बीता, पर न मिटी वो तस्वीर। लोग कहते हैं इश्क़ उम्र देखता है, पर इश्क़ तो बस दिल में ही बसता है। वो किशोरी आज भी कहीं भीतर रहती है, तेरे नाम की माला आज भी कहती है। शेष फिर क्या बचा? बस यही तो बचा है, प्रेम... जो हर जन्म में सिर्फ़ तेरा ही रहा है।
 शाम होते ही प्रेम मेरी आँखों में उतर आता है  मेरे मन में अहसास जगा जाता है  जैसे शाम को दिया जलता है,  बस वैसे ही उजाला कर जाता है। तुम्हें देखना प्रेम नहीं, तुम्हें सोचते हुए मुस्कुरा देना प्रेम है, तुम्हारा नाम सुनते ही अंदर कहीं कुछ खिल जाना प्रेम है मैं नहीं चाहती चाँद-तारे, न वादे बड़े-बड़े, बस तुम रहो, मेरे बुरे दिन में, मेरी थकी शाम में, मेरी खाली दोपहर में, मेरे पास। अगर कभी पूछो कि कितना चाहती हूँ, तो गिन नहीं पाऊँगी, बस इतना जान लो — जब तक साँस है, तुम हो, और जब तक तुम हो, मैं हूँ... तुम हो मेरे ही सदा ही  सीमा असीम  11,8,26
 तुम्हें चाहा — जैसे धूप में कोई साया चाहे, जैसे थकी आँखें कोई ख्वाब चाहें, बिना जाने, बिना समझे, बस दिल ने कहा बस तुम चाहिए मुझे  तुम्हें माँगा हर दुआ में, हर प्रार्थना में, खाली हाथों की हर याचना में, रब ने सुनी तो होगी मेरी सदा, जो तुम मेरी लकीरों में आये  तुम्हें पाया — तो लगा ज़िंदगी मिल गई, अधूरी सी जो थी, वो पूरी खिल गई, तुम मिले तो इश्क़ को नाम मिला, तुम हो तो हर लम्हे को मुकाम मिला, चाहा था, माँगा था, पा लिया तुम्हें, अब बस तुम्हीं में उम्र तमाम हो जाए... सीमा असीम  11,8,26
 इश्क़ वो नहीं जो तुम्हें बेचैन कर दे, इश्क़ वो है जो तुम्हारी बेचैनी में तुम्हारे माथे पर हाथ रख दे। इश्क़ में हिसाब नहीं होता, कौन कितना झुका, कौन कितना चला, इश्क़ में बस इतना याद रहता है कि सामने वाला हँसा तो दिन बन गया... सीमा असीम  10,8,26
 प्रेम जब मन में उतर आता है... तो घंटी नहीं बजती, बस अंदर कहीं बहुत धीरे से एक रोशनी जल जाती है, और तुम रोज़ के वही काम थोड़े ज़्यादा मन से करने लगते हो। तब आईने में चेहरा वही रहता है, पर आँखों में कोई और झांकने लगता है, गुस्सा थोड़ा देर से आता है, और माफ़ करना थोड़ा जल्दी आ जाता है। प्रेम जब मन में उतर आता है, तो तुम किसी को पाना नहीं चाहते, बस ये चाहते हो कि जिस वजह से मन इतना हल्का है, वो वजह कहीं उदास न हो... सीमा असीम  10,8,26
 "तुम आओ तो" तुम आओ तो कुछ बात बने, ये जो शाम अधूरी सी है, पूरी लगे। तुम आओ तो चाय में भी मिठास आ जाए, जो बात लफ्ज़ों में नहीं, आँखों से कही जाए। तुम आओ तो ये घर थोड़ा घर लगे, ये दीवारें भी जरा मुस्कुरा दें, तुम आओ तो कुछ बात बने। सीमा असीम  9,8,26
 देवदार तले" घने पेड़ों की छाँव या देवदार तले, चलें वहाँ जहाँ दुनिया ज़रा ठहरे। न शोर हो, न कोई जल्दी हो, बस तुम्हारा हाथ, मेरा हाथ हो, और हवा में हमारे किस्से बिखरे। देवदार की खुशबू में लिपटा हो वक्त, और हम भूल जाएं, क्या खोया, क्या पाया, घने पेड़ों की छाँव तले, बस एक पल, जो सिर्फ हमारा हो। सीमा असीम  9,8,26
 हम ऐसे ही" गले लगे कभी, हँसे मुस्कुराए, कभी रूठे तो, बिना बोले मनाए। न कोई दिखावा, न कोई बनावट, बस तुम हो, मैं हूँ, और थोड़ी शरारत। कभी चुप्पी में भी बातें हो जाएं, गले लगे कभी, हँसे मुस्कुराए
 "पहाड़ बुला रहे हैं" वो पहाड़, वो वादियाँ बुला रही हमें, कह रही हैं - आओ, थोड़ा साँस तो लो। जहाँ बादल झुक के कानों में कुछ कहें, जहाँ रस्ते भी हमें देख के मुस्कुराएँ। चलो ना, वहीं जहाँ, तुम मैं हो जाएँ, और मैं तुम, वो पहाड़, वो वादियाँ, सच में बुला रही हैं हमें। सीमा असीम  9,8,26

बार बार"

 बार बार" एक बार फिर, बार बार, उसी मोड़ पर आकर, फिर तुमसे प्यार हो जाता है। सोचती हूँ अब नहीं, अब तो आदत है तुम्हारी, फिर तुम्हारी हँसी देख, फिर से प्यार हो जाता है। एक बार फिर, बार बार, हर बार पहला सा लगता है, तुम्हारा प्यार। सीमा असीम  9,8,26

तुम्हारे बिना

 सच कहो कि जीवन क्या है तुम्हारे बिना, धड़कन तो चलती है, पर धड़कने का मजा नहीं। सच कहो कि शामें कैसी हैं तुम्हारे बिना, दिया तो जलता है, पर उजाले का मजा नहीं। सच कहो कि मैं क्या हूँ तुम्हारे बिना, नाम तो मेरा है, पर पहचान का मजा नहीं। तुम हो तो जीवन है, तुम हो तो जहान है, तुम नहीं तो इस जीवन का कोई निशान नहीं। सीमा असीम  8,8,26
 तुम हो तो जग सुंदर है, तुम हो तो हर पल सुनहरा है। तुम हो तो फूलों में खुशबू है, तुम हो तो चाँद में भी जादू है। तुम हँस दो तो सावन बरस जाए, तुम रूठो तो दिल तरस जाए। तुम हो तो ये ज़िंदगी, ज़िंदगी है, वरना तो बस साँसों की बंदगी है।
 वो पल जब हाथ हो तेरा मेरे हाथों में, तो लगे जैसे जहाँ थम गया हो साँसों में। न कोई गम, न कोई फिक्र बाकी रहे, बस तू और मैं, और ये लम्हा बाकी रहे। तेरी उँगलियों की गर्मी से दिल धड़कता है, तेरे छूने भर से हर ख्वाब महकता है। बस यही दुआ है उस एक पल के लिए, कि उम्र बीत जाए तेरा हाथ मेरे हाथों में लिए। सीमा असीम 
 यादों में हो मेरे सनम तुम ही तुम, ख्यालों में हो, ख्वाबों में हो तुम ही तुम। सुबह देखूँ तो तेरी ही रौशनी है, शाम ढले तो तेरी ही कमी है। हवा चले तो तेरी खुशबू लाए, दिल धड़के तो तेरा ही नाम दोहराए। और क्या माँगू मैं इस खुदा से सनम, जब मेरी हर दुआ में हो तुम ही तुम।
 तुम ही हो मेरे... तुम ही हो मेरे सुबह की पहली रौशनी, तुम ही हो मेरे शाम की आखिरी ख्वाहिश। तुम ही हो मेरे लबों की अधूरी हँसी, तुम ही हो मेरे दिल की पूरी ख़ामोशी। तुम मिलो तो लगता है, सब मिल गया, तुम न हो तो लगता है, कुछ भी नहीं रहा। तुम ही हो मेरे हर ख्वाब का मतलब, तुम ही हो मेरे हर लफ्ज़ का मकसद। तुम हाथ थाम लो तो सफर आसान लगे, तुम साथ चलो तो हर राह में आसमान लगे.. सीमा असीम  8,8,26
 तुम्हें देखा तो , मन में बसा लिया है, अथाह प्रेम का ये दिया जला लिया है। तुम हो तो हर सांस पूरी लगती है, मैंने तुम्हीं में अपना अनंत पा लिया
 मेरे प्रिय, मैं तुम्हें प्रेम करती हूँ, अथाह, अनंत मेरे प्रिय, मैं तुम्हें प्रेम करती हूँ, जैसे दिया बाती से करता है —  बिना किसी शर्त के, बिना किसी शोर के, बस जलता है निरंतर.. ये प्रेम गिना नहीं जा सकता, न दिनों में, न सालों में। ये अथाह है — जैसे आँखें बंद करूँ तो भी तुम, और आँखें खोलूँ तो भी तुम। मैंने तुम्हें पाने के लिए प्रेम नहीं किया, मैंने प्रेम किया, इसलिए तुम्हें हर जगह पा लिया। तुम पास हो तो संसार पूरा लगता है, तुम दूर हो तो भी मन खाली नहीं लगता, क्योंकि तुम तो मन में हो — और मन तो अनंत है। अगर कभी पूछो कि कितना, तो इतना समझना — जितना शब्द कह न सकें, और जितना मौन छुपा न सके। तुम्हारी मैं  वही जो तुम्हें मन में रखती है, अनंत तक। सीमा असीम  7,8,26
तू है पर तेरी याद गले लगाती है तू है पर तेरी याद गले लगाती है, जैसे शाम ढले चाय याद आती है। तू पास है, फिर भी हवा में ढूँढू तुझे, तेरी खुशबू हर खाली कोने में मुस्कुराती है। कभी-कभी लगता है, तू नहीं, तेरा एहसास मेरे साथ चलता है, मेरे शब्दों में, मेरी चुप्पी में, वो ही तो हर बात संभालता है। तू है पर तेरी याद गले लगाती है, और इसी याद में, मैं खुद को थोड़ा और पा जाती हूँ।
 सावन ने छुआ तो लगा, मैं खुद से मिली हूँ थोड़ा। न भागम-भाग, न कोई हिसाब, बस बूंदों संग बहता एक ख्वाब। बाहर बारिश, अंदर मैं, यादें भीगीं, मुस्कान भी नम। पर दिल को आज बुरा नहीं लगा, ये भीगना भी कितना कम। मैंने कहा मन से - इतना भी मत सोच, कभी-कभी बस बरस जाने दे, हर बात का मतलब मत खोज

लोहिया पुल की औरतें

  लोहिया पुल की औरतें बरेली में लोहिया पुल के ठीक नीचे एक छोटा सा प्राइमरी स्कूल था। पीपल के पेड़ वाला स्कूल।  उस स्कूल में पिछले बाईस साल से सुजाता पढ़ा रही थी। सुजाता मैडम। स्कूल क्या था, दो कमरे और एक बरामदा। एक कमरे में पहली और दूसरी, दूसरे में चौथी और पाँचवी। तीसरी क्लास बरामदे में बैठती थी, पीपल की छाया में। दीवारों पर बच्चों के हाथ से बने चार्ट टंगे थे - 'क से कबूतर', 'नदी के लाभ'। एक कोने में टूटी हुई ब्लैकबोर्ड थी जिस पर सुजाता रोज़ सुबह चॉक से लिखती - 'आज का सुविचार'। बाईस साल में उस स्कूल से कितने बच्चे निकले, इसका हिसाब सुजाता ने कभी नहीं रखा। रिक्शा वालों के बेटे, सब्जी बेचने वालियों की बेटियाँ, पुल के नीचे झुग्गी में रहने वाले वो बच्चे जिनके बाप-दादों ने कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा था। सुजाता उन्हें अक्षर नहीं, नाम देती थी। फिर एक दिन एक नोटिस आया। नगर निगम की मुहर लगा हुआ। "लोहिया पुल चौड़ीकरण योजना के अंतर्गत पीपल वाला प्राइमरी स्कूल भवन को ध्वस्त किया जाना है। यहाँ एक आधुनिक पार्किंग कॉम्प्लेक्स बनाया जाएगा। छात्रों को तीन किलोमीटर दूर शिवप...

जब तुम कहते हो मैं हूँ न"

 "जब तुम कहते हो मैं हूँ न" जब तुम कहते हो मैं हूँ न, तो डर भी ठहर जाता है। तूफ़ान भी रुक कर पूछता है, अब किसे डराना है। जब तुम कहते हो मैं हूँ न, तो अकेलापन भाग जाता है। एक तुम्हारे होने से ही, सारा जहाँ पास आ जाता है। जब तुम कहते हो मैं हूँ न, तो थका हुआ मन भी मुस्कुराता है। जैसे किसी सूखे पत्ते पर, पहली बारिश का बूँद गिर जाता है। बस यूँ ही कहते रहा करो, मैं हूँ न... मैं हूँ न... तुम्हारे इसी एक शब्द में, मेरा हर जन्म सँवर जाता है। सीमा असीम  6,8,26

मन से हो तुम सिर्फ मेरे ही, तन से कहीं भी

 मन से हो तुम सिर्फ मेरे ही, तन से कहीं भी मन से हो तुम सिर्फ मेरे ही, तन से चाहे जहाँ भी रहो। दुनिया घूम लेना सारी तुम, पर लौट कर मेरे ही मन में बहो। तन की दूरियाँ क्या मायने रखती हैं, जब मन ने तुम्हें अपना बना लिया। लोग कहते हैं पास नहीं हो तुम, मैंने तो तुम्हें साँसों में बसा लिया। तुम रहो जहाँ भी, गिला नहीं मुझको, बस मन की इस डोर को टूटने न देना। शरीर तो मिट्टी है, आनी-जानी है, तुम इस मन के घरौंदे में ही रहना। मैं बंधन नहीं मांगती तन का, मुझे तो तुम्हारे मन का साथ चाहिए। तन से कहीं भी होना तुम, पर मन से — बस मेरे ही पास चाहिए। सीमा असीम  6,8,26

प्रेम को ही जीना है मुझे बार-बार

 प्रेम को ही जीना है मुझे बार-बार प्रेम को ही जीना है मुझे बार-बार, चाहे धूप हो जीवन में या छाँव हो। तुम मिलो न मिलो, ये किस्मत की बात, पर मेरे हर लम्हे में बस तुम्हारा ही नाम हो। प्रेम को ही जीना है मुझे बार-बार, हर जन्म में, हर रूप में, हर सांस में। एक बार नहीं, सौ बार गिरूँ, उठूँ, पर गिरूँ भी तो सिर्फ तुम्हारे एहसास में। मैंने पूछा नहीं खुदा से कभी जन्नत का पता, मैंने माँगा नहीं कोई हिसाब, कोई हक। बस एक दुआ है जो हर बार माँगती हूँ, मेरा इश्क़ रहे, मेरा इश्क़ पाक। लोग जीते हैं दुनिया को, जमाने को, मैं जीती हूँ एक नजर, एक मुस्कान को। प्रेम ही पूजा है, प्रेम ही इबादत, और इसी इबादत में जीना है मुझे बार-बार। जीना तो सब जी लेते हैं एक बार, मुझे तो प्रेम में ही मरना है, और  प्रेम में ही जीना है बार-बार। सीमा असीम  6,8,26

मेरा ही रहेगा

 मेरा ही रहा लोगों ने कहा वो चला गया, मैंने कहा नहीं, वो कहीं नहीं गया। वो मेरी प्रार्थनाओं में रहा, मेरी डायरी के कोने में रहा, मेरी चाय की पहली चुस्की में रहा, और मेरी आँखों की नमी में रहा। दुनिया ने कहा उसे भूल जा, मैंने हँस कर कहा - जो दिल में बस जाता है, वो कभी छूटता नहीं। वो मेरा था, वो मेरा है, और किसी न किसी रूप में वो मेरा ही रहेगा। सीमा असीम 
 वो मेरा था, पर मेरा न हुआ वो मेरा था, पर मेरा न हुआ, एक ख्वाब था, जो पूरा न हुआ। उसकी हँसी मेरी सुबह थी, उसकी बातें मेरी शाम थीं, पर उसकी मंज़िल कोई और थी, हम तो बस रास्ते में मिले थे। मैंने उसे अपना जहाँ माना, उसने मुझे एक पल भर माना। मैंने उसके लिए दुआएँ लिखीं, उसने मेरी दुआओं को कभी पढ़ा ही नहीं। शिकायत नहीं है उससे आज भी, प्यार तो अपना काम कर गया। उसने जाना नहीं, पर मैंने तो प्यार करना सीख लिया। वो मेरा था, पर मेरा न हुआ, पर उससे जो प्यार किया, वो हमेशा मेरा ही रहा। सीमा असीम 
 प्यार लौट आता है कहते हैं प्यार एक बार जाता है तो लौटता नहीं, पर मैं कहती हूँ, सच्चा प्यार तो लौट आता है। भले ही रूप बदल कर, भले ही किसी और के हाथों में, पर लौटता ज़रूर है। कभी माँ की दुआ बनकर, कभी दोस्त की हँसी बनकर, कभी अपने ही बच्चे की नन्ही उँगली थाम कर। जो प्यार तुमने सच्चे दिल से दिया था, वो व्यर्थ नहीं गया। वो ब्रह्मांड में कहीं जमा हो रहा था, और आज ब्याज समेत तुम्हारे पास लौट रहा है। इसलिए जो गया उसका शोक मत करो, जो आ रहा है, उसके लिए दिल के दरवाजे खुले रखो। क्योंकि प्यार - कभी खत्म नहीं होता, बस लौट आता है।
 अब मैं खुद से प्यार करती हूँ अब मैं किसी से शिकायत नहीं करती, जो जैसा है, वैसा स्वीकार करती हूँ। अब आँखों में आँसू नहीं, सपने रखती हूँ, टूटे दिल से भी हँसना सीख गई हूँ। जो चले गए, उन्हें जाने दिया, जो हैं, उन्हें दिल से अपनाया। अब मैं खुद की सबसे अच्छी दोस्त हूँ, अपनी ही रोशनी में सबसे ज्यादा रोज़ हूँ। क्योंकि मैंने समझ लिया है - खोकर ही पाया जाता है, और टूटकर ही बनना आता है।
 मेरा विश्वास पुख्ता हुआ बहुत बार टूटी हूँ, बिखरी हूँ, फिर खुद ही खुद को समेटा है, गिरी हूँ कई बार अंधेरे में, फिर खुद ही दिया जलाया है। लोगों ने कहा, "अब नहीं होगा", रास्तों ने कहा, "अब मंज़िल नहीं", पर हर बार दिल ने धीरे से कहा - "एक कोशिश और सही।" आज पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो हर ज़ख्म एक निशान नहीं, एक मेडल लगता है। कि हाँ, मैं लड़ी थी, और मैं जीती थी। इसलिए आज कहती हूँ, गर्व से, प्यार से, और पूरी साँस लेकर - मेरा विश्वास पुख्ता हुआ। कि मैं कम नहीं हूँ, कि मेरा वक्त आएगा, कि ईश्वर देर भले कर दे, पर अंधेर नहीं करता। और जो हाथ छूट गए, वो छूटने ही थे, ताकि जो हाथ थामने हैं, उनके लिए जगह बन सके। सीमा असीम 

मेरा विश्वास - फिर से

 मेरा विश्वास - फिर से जब तुमने मेरा विश्वास तोड़ा, मेरा विश्वास दुनिया से ही उठ गया। जब तुमने मेरा हाथ छोड़ा, मैंने दुनिया से ही नाता तोड़ दिया। विश्वास तो वो पूँजी थी मेरी, जो सिर्फ़ तुम्हारे नाम की थी। पर तुम उसके लायक ही नहीं थे, ये बात देर से समझी थी। मैं छली गई थी, ठगी गई थी, लड़खड़ा कर वहीं गिर पड़ी थी। फिर धीरे-धीरे, अकेले ही, मैं खुद ही खुद से चल पड़ी थी। फिर मेरा विश्वास खुद जगा, मेरा मनोबल फिर से बढ़ा। मैं अपने ही आत्मबल से फिर से खड़ी हो गई। ये सोचकर कि - अभी भी विश्वास बाकी है इस दुनिया में। सीमा असीम  5,8,26