तुम्हें चाहा — जैसे धूप में कोई साया चाहे,

जैसे थकी आँखें कोई ख्वाब चाहें,

बिना जाने, बिना समझे,

बस दिल ने कहा बस तुम चाहिए मुझे 


तुम्हें माँगा हर दुआ में, हर प्रार्थना में,

खाली हाथों की हर याचना में,

रब ने सुनी तो होगी मेरी सदा,

जो तुम मेरी लकीरों में आये 


तुम्हें पाया — तो लगा ज़िंदगी मिल गई,

अधूरी सी जो थी, वो पूरी खिल गई,

तुम मिले तो इश्क़ को नाम मिला,

तुम हो तो हर लम्हे को मुकाम मिला,

चाहा था, माँगा था, पा लिया तुम्हें,

अब बस तुम्हीं में उम्र तमाम हो जाए...

सीमा असीम 

11,8,26

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