मेरा विश्वास पुख्ता हुआ
बहुत बार टूटी हूँ, बिखरी हूँ,
फिर खुद ही खुद को समेटा है,
गिरी हूँ कई बार अंधेरे में,
फिर खुद ही दिया जलाया है।
लोगों ने कहा, "अब नहीं होगा",
रास्तों ने कहा, "अब मंज़िल नहीं",
पर हर बार दिल ने धीरे से कहा -
"एक कोशिश और सही।"
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ,
तो हर ज़ख्म एक निशान नहीं,
एक मेडल लगता है।
कि हाँ, मैं लड़ी थी,
और मैं जीती थी।
इसलिए आज कहती हूँ,
गर्व से, प्यार से,
और पूरी साँस लेकर -
मेरा विश्वास पुख्ता हुआ।
कि मैं कम नहीं हूँ,
कि मेरा वक्त आएगा,
कि ईश्वर देर भले कर दे,
पर अंधेर नहीं करता।
और जो हाथ छूट गए,
वो छूटने ही थे,
ताकि जो हाथ थामने हैं,
उनके लिए जगह बन सके।
सीमा असीम
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