मन से हो तुम सिर्फ मेरे ही, तन से कहीं भी

 मन से हो तुम सिर्फ मेरे ही, तन से कहीं भी


मन से हो तुम सिर्फ मेरे ही,

तन से चाहे जहाँ भी रहो।

दुनिया घूम लेना सारी तुम,

पर लौट कर मेरे ही मन में बहो।


तन की दूरियाँ क्या मायने रखती हैं,

जब मन ने तुम्हें अपना बना लिया।

लोग कहते हैं पास नहीं हो तुम,

मैंने तो तुम्हें साँसों में बसा लिया।


तुम रहो जहाँ भी, गिला नहीं मुझको,

बस मन की इस डोर को टूटने न देना।

शरीर तो मिट्टी है, आनी-जानी है,

तुम इस मन के घरौंदे में ही रहना।


मैं बंधन नहीं मांगती तन का,

मुझे तो तुम्हारे मन का साथ चाहिए।

तन से कहीं भी होना तुम,

पर मन से — बस मेरे ही पास चाहिए।

सीमा असीम 

6,8,26

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