प्रेम को ही जीना है मुझे बार-बार

 प्रेम को ही जीना है मुझे बार-बार


प्रेम को ही जीना है मुझे बार-बार,

चाहे धूप हो जीवन में या छाँव हो।

तुम मिलो न मिलो, ये किस्मत की बात,

पर मेरे हर लम्हे में बस तुम्हारा ही नाम हो।


प्रेम को ही जीना है मुझे बार-बार,

हर जन्म में, हर रूप में, हर सांस में।

एक बार नहीं, सौ बार गिरूँ, उठूँ,

पर गिरूँ भी तो सिर्फ तुम्हारे एहसास में।


मैंने पूछा नहीं खुदा से कभी जन्नत का पता,

मैंने माँगा नहीं कोई हिसाब, कोई हक।

बस एक दुआ है जो हर बार माँगती हूँ,

मेरा इश्क़ रहे, मेरा इश्क़ पाक।


लोग जीते हैं दुनिया को, जमाने को,

मैं जीती हूँ एक नजर, एक मुस्कान को।

प्रेम ही पूजा है, प्रेम ही इबादत,

और इसी इबादत में जीना है मुझे बार-बार।

जीना तो सब जी लेते हैं एक बार,

मुझे तो प्रेम में ही मरना है, और 

प्रेम में ही जीना है बार-बार।

सीमा असीम 

6,8,26

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