मैं हूँ यहाँ पर, तुम हो वहाँ पर,

बीच में ये सावन की दीवार है 


मैं मेहंदी लगाए बैठी हूँ,

तुम यादों में उलझे बैठे हो,

मैं तीज गा रही हूँ,

तुम किस ख्याल में बैठे हो?


आ जाओ न, ये दूरी सही नहीं जाती है 

मुझे तो अब ये जुदाई बहुत रुलाती है 

सावन की ऋतु यूँ ही न चली जाये 

तेरी याद बेतरहा मुझे सताती है..

सीमा असीम 

15,8,26

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