मेरे प्रिय, मैं तुम्हें प्रेम करती हूँ, अथाह, अनंत
मेरे प्रिय,
मैं तुम्हें प्रेम करती हूँ,
जैसे दिया बाती से करता है —
बिना किसी शर्त के, बिना किसी शोर के,
बस जलता है निरंतर..
ये प्रेम गिना नहीं जा सकता,
न दिनों में, न सालों में।
ये अथाह है — जैसे आँखें बंद करूँ तो भी तुम,
और आँखें खोलूँ तो भी तुम।
मैंने तुम्हें पाने के लिए प्रेम नहीं किया,
मैंने प्रेम किया, इसलिए तुम्हें हर जगह पा लिया।
तुम पास हो तो संसार पूरा लगता है,
तुम दूर हो तो भी मन खाली नहीं लगता,
क्योंकि तुम तो मन में हो — और मन तो अनंत है।
अगर कभी पूछो कि कितना,
तो इतना समझना —
जितना शब्द कह न सकें, और जितना मौन छुपा न सके।
तुम्हारी मैं
वही जो तुम्हें मन में रखती है, अनंत तक।
सीमा असीम
7,8,26
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