शाम होते ही प्रेम मेरी आँखों में उतर आता है 

मेरे मन में अहसास जगा जाता है 


जैसे शाम को दिया जलता है,

 बस वैसे ही उजाला कर जाता है।


तुम्हें देखना प्रेम नहीं,

तुम्हें सोचते हुए मुस्कुरा देना प्रेम है,

तुम्हारा नाम सुनते ही

अंदर कहीं कुछ खिल जाना प्रेम है


मैं नहीं चाहती चाँद-तारे,

न वादे बड़े-बड़े,

बस तुम रहो,

मेरे बुरे दिन में, मेरी थकी शाम में,

मेरी खाली दोपहर में,

मेरे पास।


अगर कभी पूछो कि कितना चाहती हूँ,

तो गिन नहीं पाऊँगी,

बस इतना जान लो —

जब तक साँस है, तुम हो,

और जब तक तुम हो, मैं हूँ...

तुम हो मेरे ही सदा ही 

सीमा असीम 

11,8,26

Comments

Popular posts from this blog

प्रेम

बारिश