पुराण कथा
गतांक से आगे
समुन्द्र मंथन

विष निकलने से देवताओं और दानवों में अफरा-तफरी मच गई. इस विष को लेने के लिए न तो देवता तैयार हुए और न दानव. तब भगवान शिव ने इस विष को पी लिया और तभी से भगवान शिव का नाम नीलकंठ पड़ गया.
उसके बाद समुद्रमंथन से कामधेनु गाय निकली, यह एक चमत्कारी गाय है, जिसमें दैवीय शक्तियाँ है और जिसके देखने मात्र से लोगों के दुःख दूर हो जाती हैं. यह गाय जिसके पास होती थी, उसे किसी तरह की तकलीफ नहीं होती थी. इस गाय का दूध अमृत के समान माना जाता था.
समुद्रमंथन से उच्चै:श्रवा नाम का घोड़ा प्रकट हुआ. यह सफेद, चमकीला, मजबूत कद-काठी का दिव्य घोड़ा था. इसे दैत्यराज बलि ने ले लिया.
 समुद्रमंथन से 4 दांतों वाला हाथी ऐरावत प्रकट हुआ, इसके दिव्य रूप के आगे कैलाश पर्वत भी फीका लगता है. ऐरावत के साथ 64 और सफेद हाथी समुद्र मंथन से निकले. ऐरावत को इंद्र ने पाया. ऐरावत, पैनी नजर और गहरी सोच का प्रतीक है.
 समुद्र मंथन से माँ लक्ष्मी निकलीं. माँ लक्ष्मी के तेज और सौंदर्य ने सभी को आकर्षित किया. माँ लक्ष्मी को मनाने के लिए सभी प्रयत्न करने लगे. माँ लक्ष्मी ऋषियों के पास गई, ज्ञानी और तपस्वी होने के बावजूद वे क्रोधी भी थे, इसलिए माँ लक्ष्मी ने उन्हें नहीं चुना. इसी तरह देवताओं को महान होने पर भी कामी, मार्कण्डेयजी को चिरायु होने पर भी तप में लीन रहने, परशुराम जी को जितेन्द्रिय होने पर भी कठोर होने की वजह से नहीं चुना. अंत में माँ लक्ष्मी ने शांत, सात्विक, सारी शक्तियों के स्वामी और कोमल हृदय वाले भगवान विष्णु को चुना.
समुद्र मंथन से कई सुंदर अप्सराएँ निकली. जो किसी को भी मोहित करने में सक्षम थीं. अप्सराएँ देवताओं को प्राप्त हुई.
समुद्र मंथन से संपूर्ण कलाओं के साथ चन्द्रमा भी प्रकट हुए.!
सुन्दर आंखों वाली कन्या के रूप में वारुणी देवी प्रकट हुई, जो दैत्यों को मिली.
समुद्र मंथन से शंख भी निकला. शंख को बहुत हीं शुभ माना जाता है, और शंख हर हिन्दू के पूजा घर में रहता हीं है. मंथन से उत्पन्न होने के कारण इसे माँ लक्ष्मी का भाई भी कहते हैं.
  समुद्र मंथन से पारिजात नामक वृक्ष निकला. इस वृक्ष की खासियत यह है कि इसे छूने से हीं थकान मिट जाती है. हनुमान जी का वास भी इस वृक्ष में माना गया है.
समुद्र मंथन से सभी रत्नों में श्रेष्ठ कौस्तुभ मणि निकला. इसकी चमक तीनों लोकों को प्रकाशित करने की क्षमता रखती थी.
समुद्र मंथन से कल्पवृक्ष निकला. मान्यता है कि कल्पवृक्ष स्वर्ग में मौजूद है, इस पेड़ की खासियत यह है कि मांगने वाले के मन की हर इच्छा यह पूरी कर देता है.!

और सबसे अंत में धनवन्तरि और अमृत – समुद्रमंथन से आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान धनवन्तरि हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए. राक्षसों की नजर अमृत पर पड़ी, उन्होंने वह कलश धनवन्तरि से छीन लिया. अमृत के लिए देव-दानवों में लड़ाई होने लगी. तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किय़ा. मोहिनी ने अमृत देवताओं को पिला दिया. लेकिन राहु नाम के राक्षस ने भी थोड़ा अमृत पी लिया. लेकिन अमृत के राहु के कंठ से नीचे उतरने से पहले हीं  भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया. फिर भी अमृत के असर से उसका सिर अमर होने के कारण भगवान  ब्रह्मा ने उसे ग्रह के रूप में मान्यता दे दिया. इसके बाद अमृत से वंचित दैत्यों के देवताओं पर हमला करने से देवासुर संग्राम हुआ. भगवान विष्णु के मोहिनी के रूप से भगवान शिव भी मोहित हो गए थे

इस तरह देवताओं को अमृत पिलाकर भगवान विष्णु वहाँ से लोप हो गये। उनके लोप होते ही दैत्यों की मदहोशी समाप्त हो गई। वे अत्यन्त क्रोधित हो देवताओं पर प्रहार करने लगे। भयंकर देवासुर संग्राम आरम्भ हो गया जिसमें देवराज इन्द्र ने दैत्यराज बालि को परास्त कर अपना इन्द्रलोक वापस ले लिया।

समाप्त

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