रिया तू मुस्करा
मैं तुम्हें लिखती हूँ ! प्रिय, मेरे एक एक शब्द में
तुम ही होते हो ......मेरे शब्दों में ही नहीं मेरी स्वांसों में ....मेरी आखों मे
..मेरी धड़कन में ...मेरे लबों पर सिर्फ तुम्हारा ही नाम होता है ...... कभी एक पल
को भी जब कुछ याद करती हूँ तो मेरी आँखों से आँसू बहने लगते हैं ! ये आंसूं मेरी
आँखों से नहीं निकलते बल्कि मेरी कोख में पलते हैं ...मेरी आत्मा को दर्द से चीरते
हुए ....मेरी आँखों से बह जाते हैं ! न जाने कैसे सह पाती हूँ उस असहनीय पीड़ा को
......शायद इसीलिए मेरी आँखों की नमी कभी सूखती ही नहीं ......तभी तो मैं उन
यादों में कभी विचरना ही नहीं चाहती और हर एक छण में तुम्हें अपने करीब किए रहती
हूँ फिर भी कभी न चाहते हुए भी उन पलों में चली जाती हूँ ...जब हम साथ थे और हाथों में हाथ डाले उस पब्लिक प्लेस में भी बिना किसी हिचक के एक दूसरे में डूबे बतियाते
रहते थे, कितनी अथाह खुशी से मन भरे रहते थे ! अब न जाने ऐसा क्या हुआ कि वे पल
याद आते ही दिल में एक हूक सी उठती है, दिल भरा भरा सा रहता
है ! क्या हम गलत थे ? अगर हाँ, तो हम
एक क्यों हुए ? ईश्वर ने हमें क्यों मिलाया ? क्या इस तकलीफ को, दर्द को सहने के लिए .....मेरे
प्रिय तुम भी तो ऐसे ही उदास हो जाते होगे, हैं न ? भर आती होंगी तुम्हारी भी आँखें .....सीने में स्वांस अटक अटक जाती होगी ?
पर सुनो प्रिय, नहीं तुम्हें
उदास नहीं होना है चलो हम मुस्करा लेते हैं, आओ कुछ बातें
कर लेते हैं, मन को समझाते हुए ....तुम्हें याद है न वो
हमारा प्रथम स्पर्श .....जिसे याद करते ही मानों रोम रोम झंकृत हो गया..... बज उठी हो
जैसे बांसुरी .....रात के इस चौथे पहर में ...रुनझुन कर बजने लगी पायल ......हाथों
के कंगन खनक उठे और मैंने अपनी बाहों का हार तुम्हारे गले में डाल दिया ...अब मेरी उन आँखों में न नजर
मिलाने का साहस रहा, न ही डूब जाने का ....बंद कर ली गयी मेरी
आँखों पर रख दिये थे तुमने अपने होठ .....जगा दी थी अन्तर्मन में अनोखी सरगम
.....जीवन को जीने की चाह .....राजनीगंधा के फूलों की खुशबू बिखर गयी थी हर तरफ
......आओ प्रिय फिर से खो जाते हैं उसी सुगंधित खुशबू में ....सबके जागने से पहले....।
भोर होने से पहले ......
सीमा
क्रमशः

Comments
Post a Comment