रिया तू मुस्करा
सुनो प्रिय जहां प्रेम होता है वहाँ स्वार्थ नहीं होता और जहां स्वार्थ होता है वहाँ प्रेम का क्या काम वैसे भी यह दुनियाँ स्वार्थ से भरी हुई है तो क्या हम अपने प्रेम को स्वार्थ से परे नहीं कर सकते क्योंकि उस प्रेम का क्या अर्थ जहां स्वार्थ का नाम मात्र का भी प्रवेश हो जाये फिर उस दुनियाँ में जीने का क्या मतलब ....
आओ प्रिय इस सोती हुई रात में तुम अपनी प्रेम बांसुरी से जगा दो मेरी आंखो में दिवास्वप्न ,,,,,,सुखों की एक अद्भुत दुनियाँ, जहां कभी स्वार्थ न हो ! देखो, रात चुपके चुपके मनुहार के घुंघरू बांध कर सम्मोहित कर रही है ....मन में उमंगों की तरंगें भर रही है .....चलो इस रात के समुंदर में उतर के डूब जाये हम उन बातों में, जो कभी तुम हमसे कह ही नहीं पाये या कहते कहते रुक गए.थे .....
देखो अभी सासों का उतार चड़ाव उफान पर है ....अभी भी आस है समर्पण की ....सुनो प्रिय सच तो यह है कि जो हमारे मन में होता है या दिल मे होता है वो न जाने कैसे आ जाता है हमारे लबों पे, सपनों में, पूजा के समय या किसी और का भी नाम लेते वक्त भी उसी का नाम ....हमारी हर बात में .....समझ ही नहीं आता न जाने कैसे रच जाते हैं उसके नाम के ही अनगिनत गीत .....होठों पर पसर जाता है एक दीघ्र कालिक मौन ....अचंभित हूँ न जाने कैसे ....
सीमा असीम
क्रमशः
सुनो प्रिय जहां प्रेम होता है वहाँ स्वार्थ नहीं होता और जहां स्वार्थ होता है वहाँ प्रेम का क्या काम वैसे भी यह दुनियाँ स्वार्थ से भरी हुई है तो क्या हम अपने प्रेम को स्वार्थ से परे नहीं कर सकते क्योंकि उस प्रेम का क्या अर्थ जहां स्वार्थ का नाम मात्र का भी प्रवेश हो जाये फिर उस दुनियाँ में जीने का क्या मतलब ....
आओ प्रिय इस सोती हुई रात में तुम अपनी प्रेम बांसुरी से जगा दो मेरी आंखो में दिवास्वप्न ,,,,,,सुखों की एक अद्भुत दुनियाँ, जहां कभी स्वार्थ न हो ! देखो, रात चुपके चुपके मनुहार के घुंघरू बांध कर सम्मोहित कर रही है ....मन में उमंगों की तरंगें भर रही है .....चलो इस रात के समुंदर में उतर के डूब जाये हम उन बातों में, जो कभी तुम हमसे कह ही नहीं पाये या कहते कहते रुक गए.थे .....
देखो अभी सासों का उतार चड़ाव उफान पर है ....अभी भी आस है समर्पण की ....सुनो प्रिय सच तो यह है कि जो हमारे मन में होता है या दिल मे होता है वो न जाने कैसे आ जाता है हमारे लबों पे, सपनों में, पूजा के समय या किसी और का भी नाम लेते वक्त भी उसी का नाम ....हमारी हर बात में .....समझ ही नहीं आता न जाने कैसे रच जाते हैं उसके नाम के ही अनगिनत गीत .....होठों पर पसर जाता है एक दीघ्र कालिक मौन ....अचंभित हूँ न जाने कैसे ....
सीमा असीम
क्रमशः
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