रिया तू मुस्करा
लो मैंने हर सिंगार के फूल चुन चुन कर इकट्ठे कर लिए अब इन्हें बिछा दिया उस राह में जिधर से तुम आओगे ......सुनो प्रिय, जब तुम आना न, तब वो सफ़ेद किरमिची वाला कुर्ता पायजामा पहन कर ही आना क्योंकि वो तुम पर बहुत फबता है .........और हाँ ऊपर से मरून चुनरी प्रिंट का स्टॉल डाल लेना उसमें तुम्हारे चेहरे का रंग कुछ और निखर आता है !
सुनो प्रिय, तुम्हारे मुसकुराते चेहरे की शान बढ़ जाती है उसमें .......मैं द्वार पर खड़ी तुम्हारा इंतजार करती मिलूँगी .....हाथ में पूजा की थाली पकड़े, मैं लाल रंग की साड़ी पहन कर पूरा सोलह श्रीगार कर लूँगी ......तुम्हारे माथे पर लगा कर रोचना फिर आरती उतार लूँगी और वो अधूरी ख़्वाहिश पूरी कर लूँगी जो उस पहाड़ी पर देवी मंदिर में माथे पर रोचना लगते वक्त अधूरी रह गयी थी ....क्योंकि तब वहाँ पर मेरे पास आरती की थाली नहीं थी ....
झुक कर छू लूँगी तुम्हारे चरण ॥तुम चूमकर मेरा माथा लगा लोगे सीने से ........प्रिय उस समय मैं एक बार फिर से जी उठूँगी और बिखेर दूँगी तब्बसुम अपने मुरझाए लबों पर ......खुली छत पर पड़े महकते फूलों से सजे उस झूले पर बैठ कर गुजर जाएगी सारी रात , अपने हाथों से बनाए पकवानों को तुम्हें अपने ही हाथों से खिलाते ....चाँदनी के संग में आए उस चाँद को निहारते हुए जिसे देखते हुए मैं अपनी रातें गुजरती आई हूँ ..........
सीमा असीम
क्रमशः
लो मैंने हर सिंगार के फूल चुन चुन कर इकट्ठे कर लिए अब इन्हें बिछा दिया उस राह में जिधर से तुम आओगे ......सुनो प्रिय, जब तुम आना न, तब वो सफ़ेद किरमिची वाला कुर्ता पायजामा पहन कर ही आना क्योंकि वो तुम पर बहुत फबता है .........और हाँ ऊपर से मरून चुनरी प्रिंट का स्टॉल डाल लेना उसमें तुम्हारे चेहरे का रंग कुछ और निखर आता है !
सुनो प्रिय, तुम्हारे मुसकुराते चेहरे की शान बढ़ जाती है उसमें .......मैं द्वार पर खड़ी तुम्हारा इंतजार करती मिलूँगी .....हाथ में पूजा की थाली पकड़े, मैं लाल रंग की साड़ी पहन कर पूरा सोलह श्रीगार कर लूँगी ......तुम्हारे माथे पर लगा कर रोचना फिर आरती उतार लूँगी और वो अधूरी ख़्वाहिश पूरी कर लूँगी जो उस पहाड़ी पर देवी मंदिर में माथे पर रोचना लगते वक्त अधूरी रह गयी थी ....क्योंकि तब वहाँ पर मेरे पास आरती की थाली नहीं थी ....
झुक कर छू लूँगी तुम्हारे चरण ॥तुम चूमकर मेरा माथा लगा लोगे सीने से ........प्रिय उस समय मैं एक बार फिर से जी उठूँगी और बिखेर दूँगी तब्बसुम अपने मुरझाए लबों पर ......खुली छत पर पड़े महकते फूलों से सजे उस झूले पर बैठ कर गुजर जाएगी सारी रात , अपने हाथों से बनाए पकवानों को तुम्हें अपने ही हाथों से खिलाते ....चाँदनी के संग में आए उस चाँद को निहारते हुए जिसे देखते हुए मैं अपनी रातें गुजरती आई हूँ ..........
सीमा असीम
क्रमशः

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