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Showing posts from September, 2017
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रिया तू मुस्करा दिल भरता नहीं, आँखें रजती नहीं चाहें कितनी भी देर प्रिय तुम्हें देखती रहूँ फिर भी मन करता है कि बस तुम्हारी तस्वीर को यूं ही बैठी देखती रहूँ !सुनो प्रिय जब तुमने मुझे अपने प्रेम भरे स्पर्श से छुआ था वो प्यारी छुअन मेरे मन में बसी हुई है ...जब तुमने मुझसे प्रेम से बातें की थी उन सबकी महक हवाओं में रजनी गंधा के फूलों की खुशबू सी महक रही है ...जहां जहां हम मिले उन गली रस्तों पर फूलों ने अपना बसेरा कर लिया है ...वे इस इंतजार में हैं कि हमारे आने तक यूं ही खिले रहें ...सुनो प्रिय, मेरा दिल न जाने क्यों तुम्हें इतना याद कर रहा है ? न जाने क्यों आँख नम कर रहा है ? न जाने क्यों तुम्हें गले लागने को आतुर हो रहा है .?..क्यों तुम्हारी याद मुझे बेचैन कर रही है ? प्रिय मैं तुमसे उस क्षितिज पर मिलना चाहती हूँ जहां पर देवता भी हमारे मिलन पर खुशी के गीत गाने लगते हैं ! आकाश नूर बरसाने लगता है और ब्रह्मांड खुशी के गीतो पर झूमने लगता है ....ओ मेरे प्रिय देव मंदिर में बजते शंख, घंटे की मधुर धुन के बीच होती पवित्र आरती की तरह हमारे मिलन की राह वो प्रकृति भी देख रही है ....ओ देव मैं ...
हर लम्हा हर शय में यूं ही पाओगे मुझे मैं खुशबू बनकर ज़र्रे  ज़र्रे में बिखर जाऊँगी भुला दी सारी दुनियाँ मैंने तुम्हारे लिए इस प्यार में ओ मेरे प्रिय रखवा दिया नाम अपना कमली तुम मेरी जान हो, बस तुम ही मेरा अरमान हो उस रब का लाख लाख शुक्रिया जिसने हमें मिलाया . लग जाये सारी दुआएं तुझे भले ही मैं हो जाऊ कभी उदास पर तुम्हारे चेहरे पर सदा यूं ही खिलती रहे मुस्कान  खुश रहना तुम यूं ही सदा !! सीमा असीम
रिया तू मुस्करा आज दिल न जाने क्यों भरा भरा सा है ? प्रिय तुम्हारी बातें आज बहुत याद आ रही हैं ,,,वो मुस्कराते हुए कहना ...समझाना ...बहुत याद आ रहा है ...कभी न सोचा था, न ही कभी समझा था,,कि प्रिय आपकी याद में यूं भी हालत हो जाएगी .....दीवानगी इस कदर बढ़ जाएगी ...या रब ये कैसा जादू है जो हर पल में अपनी ही धुन में मगन किए रहता है ...छु दिया है तुमने मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व को ....मेरी बंद आँखों की पलकों को चूमकर तुम खवाब बनकर आकर समा गये हो ...न जाने ये कैसा अहसास कि तुम्हारी छूअन से सिहर गया है मेरा एक एक अंग ॥ ओ मेरे प्रिय, ओ मेरे आराध्य मैं तुम्हें अपनी यादों में भरकर लिख रही हूँ हवाओं की देह पर एक प्रेम गीत॥  देखना प्रिय, जब पुरवाई चलेगी ...तब शायद वो गीत तुम्हारे कानों में आकर गुनगुनाए और मेरी याद दिला जाये ...मेरी विरह की पीर तब तुम सुन सको और फिर शायद यूं ही मेरी याद में कुछ पल को ही सही पर खो सको, मेरी दीवानगी का आलम समझ सको ... तन से जुदा हैं भी तो क्या एक जान हैं हम एक जान हैं हम एक जान हैं हम क्रमशः  सीमा असीम
रिया तू मुस्करा सागर की बाहों में मौजें हैं जितनी !  हमको भी तुमसे मोहब्बत है उतनी !!  हर पल एक लहर सी उठती है मन में और टकराती है आकर मेरे ख़यालों से फिर पलट कर चली जाती है और फिर यह सिलसिला यूं ही चलता ही रहता है बिना किसी भी बात की परवाह किए ! ऐसा क्यों होता है ? हर पल तुमसे बात करने की चाहत क्यों पैदा हो गयी है मन में ! क्यों हूक सी उठती है प्रिय मेरे मन में ? क्यों अनेकों सवाल, जवाब करता रहता है मन ? क्यों हर घड़ी तस्ब्बुर में तुम रहते हो ? क्यों कोई आरज़ू है मन में ? क्यों यह बेकरारी सी बनी रहती है ?  प्रिय जब तुम मेरे साथ हो .....तो यह कैसी आरज़ू ? मुझे बस इतना पता है कि यह चाहत कभी न तो कम होगी न ही कभी अब उदास होगी ....क्योंकि मुझे मालूम है मेरा प्यार सिर्फ आपके लिए है ... मैं सिर्फ आपकी ही हूँ प्रिय ! सुनो प्रिय मैं तुम्हें बंधन में नहीं बांधना चाहती पर मैं खुद को पल भर को भी तुमसे विलग नहीं होने देना चाहती.....बस इतना समझ लो कि जब तक यह प्रेम है तब तक ही मेरा जीवन है........क्रमशः  सीमा असीम
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रिया मुस्करा तेरा मेरा साथ रहे  तेरा मेरा साथ रहे  धूप हो छाया हो  दिन हो कि रात हो  न जाने कैसे और कब गुजर जाते हैं ये दिन, ये रातें कुछ पता ही नहीं चलता ! एक खूबसूरत सा नशा दिमाग में बसा रहता है जो बनाए रखता है दीवाना, नशे में चूर डूबी रहती हूँ उस अथाह प्रेम सागर में जिससे उबरने का कुछ और करने का ख्याल ही नहीं रहता ! सुनो प्रिय, क्या यूं ही तुम भी मुझे याद करते हो ? मेरे ख्यालों में खोते हो या कभी डुबकी ही लगाते हो ?वैसे इस बात का कोई फर्क भी तो नहीं पड़ता है क्योंकि मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ रखा है और चलती चली जा रही हूँ अपनी ही धुन में मस्त उस दुरुह रास्ते पर, जहां हम साथ हैं हमेशा और हमारे हाथों में हाथ हैं ....ऊंचे नीचे ऊबड़ खाबड़ उस रास्ते को अब समतल करके, फूलों से महका दिया है   .....प्रिय यह प्रेम ही तो है सिर्फ मेरा प्रेम और सिर्फ तुम्हारे लिए ....  प्यार की प्रीत की यूं ही बरसात रहे .... क्रमशः  सीमा असीम
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गतांक से आगे  रिया मुस्करा जब मन में प्रेम पलता है तो आँखों में पवित्रता उतर आती है, न जाने कैसी देवीय शक्ति मन में घर कर जाती है ! वैसे बहुत ही आसान है न, किसी से भी प्रेम हो जाना,, पर बहुत ही मुश्किल है उसे निभाना और उसमें ही जीते चले जाना ! पल भर को भी अपने प्रिय को अपने ख़यालों से दूर न जाने देना ! सुनों प्रिय, जब हल्की सी भी आहट होती है न, तो यूं लगता है मानों तुम आ गए हो! आज जब दरवाजे के पास लगी विंड चाइम ने हवा के सहारे हिलकर सुरीली धुन बिखेरी तो यूं लगा कहीं तुम ही तो नहीं हो ? कैसे अचकचा के उठ कर बाहर आई ....न जाने कैसी घबराहट कि अगर वाकई तुम ही हो तो मैं कैसे तुम्हारा स्वागत करूंगी ? ओहह आज तो मैंने अपने बाल भी नहीं सवारे ! लेंकिन तुम तो यहाँ कहीं नहीं हो ... पागल खुद को ही कहकर हल्का सा सर झटकते हुए सोचा कि तुम तो मेरे साथ ही हो फिर कैसा इंतजार ? फिर कैसी बेचैनी ? फिर कैसी तड़प ? सुनो प्रिय, यह तुम्हारा प्रेम ही तो है जो मुझे हर हाल में खुश रहना, मुसकराना सिखता है ....  क्योंकि मैं समझ गयी हूँ कि मेरी मुस्कान, तुम्हारे लिए वरदान है ...आशीर्वाद है उस रब का...
बाहों में तेरी आके लगा मेरा सफर तो यही तक है तुमसे शुरू तुमपे ही खत्म मेरी कहानी यही तक है सौ बार तलाशा है खुद को कुछ न मिला तेरे सिवा मुझको साँसों से तोड़ दूँगी रिश्ता सनम पर कभी तुझसे तोड़ न पाऊँगी आँख खुले या हो बंद बस सूरत है तेरी जुबान पे तेरा ही नाम रहे यही एक ख़्वाहिश है भुला दिया है खुद को ही पर तुमको भूल न पाऊँगी !!
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रिया मुस्करा न जाने कितने रूप होते हैं इन आँसूओं के, न जाने कितने रंग और न जाने कितनी भाषाएँ ! सच में हैरत में पड़ जाती हूँ जब खुशी से उछलते, चहकते  हुए भी आँखों से अश्रु छलक पड़ते हैं ,,,मन खुशी में भी नम सा हो जाता है ! मेरे प्रिय क्या यह वाकई सच है कि ख्वाब सच हो जाते हैं ? बिना किसी रुकावट के प्रकृति हमारा साथ निभाने लगती है और अंग अंग में उछाह का संचार हो जाता है ! बस यह एक ख़्वाहिश ही तो थी और वो सच हो गयी !  प्रकृति हमेशा खुशी देती है ....सच का साथ देती है ..... निर्मल मन जन सो मोही पावा .....वो ख्वाब जिसमें मैं दिन रात डूबी रहती हूँ ...एक ऐसा नशा जिससे कभी उबर ही नहीं पाती ,,,,और जीती रहती हूँ उन पलों को, जब हम साथ थे ......बर्फ से घिरे उस स्थान पर अब फूल खिल गए हैं प्रिय, मेरा प्रेम महक उठा है ...खुशबू बिखेरने लगा है ...प्रिय, क्या तुम मेरी धड़कनों के संग धड़कती इस खुशी को महसूस कर सकते हो ? खुशी से छलक्ती मेरी आँखों की भाषा पढ़ सकते हो ? जी सकते हो न वही खूबसूरत पल कल्पनाओं में ?... जहां न नफरत ॥न लड़ाई ...सिर्फ प्यार .....बेशुमार..... दुआ में हाथ उठाकर खुशी तो ...
क्या किसी को आई लव यू कह देना प्रेम है ? क्या किसी को गले लगा लेना प्रेम है ?क्या किसी के साथ पूरा जीवन बिता देना प्रेम है ? क्या प्रेम कोई संबंध है ? शायद नहीं .... क्योंकि प्रेम सीमित नहीं है...प्रेम का असली रूप तो विस्तार है... प्रेम में दो नहीं होते ....हाँ संबंध में होते हैं ....संबंध में अहम होता है .....प्रेम में सिर्फ समर्पण होता है ...हर हाल में बस अपने प्रिय की खुशी .....तभी तो जब हमारे प्रिय को तकलीफ होती है तो आँख नम हो जाती है.....और उसकी खुशी पर मन जश्न सा मनाने लगता है.....हम बिना किसी बंधन के बस उसकी ज़िंदगी जीने लगते हैं .....उसके अहसासों को ही  अपना जीवन  अपनी ऊर्जा मान  लेते हैं ...  बिना किसी शर्त के होने वाला प्रेम कभी  परवाह ही नहीं करता किसी भी बात की ...वो तो बस मगन रहता है हरहाल में अपने मन में बसे प्रिय के साथ .....सीमा असीम
रूह सृष्टि में चाँद तब मुस्कराएगा सूरज आसमां के पीछे दुबक जायेगा घनघोर घटाए भी भूलेंगी बरसना उस पल कुछ पल को धरती भी थमेगी, ठिठक जाएगी, भूल जाएगी घूमना जब कल्पनाओं में मैं तुम्हें अपने करीब कर लेती हूँ तुम्हारे मौन में भी तुमको सुनती हूँ और वे जानी पहचानी सी धड्कने संग संग धडकने लगती हैं  समा जाती है उस वक्त मेरी रूह में तुम्हारी रूह तब महक उठेगा हमारा पारदर्शी सच्चा प्रेम चन्दन सा सुनो प्रिय, जैसे रुई के नर्म फाये सा झरता है बर्फ उससे एकटक निहारती मेरी आँखें बना देगी तुम्हारा अक्स मुस्कुराता हुआ टकटकी लगाये मेरी ओर प्रेम से निहारता हुआ यह प्रेम ही है जो धड़कता है धड़कनों में  उस प्रिय का नाम उच्चारित करता हुआ !! सीमा असीम
गतांक से आगे सुबह सवेरे सूर्य को अर्घ्य देते ही उसकी पहली किरण ने प्रेम की मीठी सी छुअन दे दी आकर, अथाह ऊर्जा से भरा मन मुस्करा दिया  ,,पल पल मन ही मन रटते हुए उस प्यारे नाम के शब्दों के बोल हल्के से कानों में गूंज गए ... समझ नहीं पाती हूँ कभी कभी तुम कैसे जान जाते हो मेरे मन की बात लेकिन प्रिय सच तो यह है कि मैं भी तो समझती हूँ तुम्हें, तुम्हारे मन की हर बात ....बिना कुछ कहे, बिना कुछ सुने ,,,,,प्रेम के पवित्र बंधन में बंधे हमारे मन जिन्हें किसी प्रतिदान की जरूरत ही कब है ....सबसे ज्यादा जरूरी है उन प्यारे लबों की मुस्कान और मन की सच्ची खुशी जो अलग हैं, सबसे अलग ,,,दुनिया का सबसे प्यारा इंसान, मेरे मन में रहने वाला जिसकी खुशी के लिए निसार हैं मेरी हर खुशी,,,,क्या तुम जानते हो प्रिय, छल, कपट, प्रपंच युद्ध से कभी कुछ हासिल हुआ है ? कभी उनको श्रद्धा के साथ याद किया गया है,,,, या उनका नाम लेते वक्त कभी कोई खुश हुआ है ? नहीं न ....बस प्यार के दो शब्दों को जीने वाले इन्सानों ने अपना वर्चस्व हमेशा कायम रखा है न ? तो फिर कैसी ये मारा मारी है दुनियाँ में ? क्यों लोग पा लेना चाहत...
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गतांक से आगे रिया तू मुस्करा उदासी का एक पौधा रोप दिया था मैंने अपने भीतर  सीचने लगी थी उसे अपने अश्कों से दर्द के पत्ते लहलहाने लगे थे  उसमें धीरे धीरे  एकटक एक ही दिशा में देखते हुए  ठहर गयी थी निराश आँखें  मन में अनवरत बहता हुआ मीठे पानी का झरना  सूखने लगा था  न कोई ख़्वाहिश  न ही कोई उम्मीद  दुआओं में उठे रहते थे हाथ  तुम्हारी खुशी के लिए  चुप्पी लगे होठों पर थी एक ही प्रार्थना  जो ख्वाब हैं तुम्हारे मन में  वे न रह जाये कोई भी अधूरे  मेरा क्या है मैं तो प्रेम को अकेले ही जी लूँगी  गुनती बुनती सुनती  उन प्रेमगीतों को  जो मैंने लिख डाले थे  विरह में जीते हुए  किसी शोर शराबे और विरोध से दूर  खामोशियों तन्हाइयों में जीते हुए मन में फैले निर्वात के साथ  अपनी आवाज कहीं नहीं फैलाना चाहती थी लेकिन न जाने कैसे सुन ली तुमने मेरी आवाज  ना जाने कैसे पढ़ लिए मेरे लिखे प्रेम गीत  कि छू दिया आकार मुझे अहसासों में  और उदासियों के घने दरख्त पर...
जिस दिन याद आएगी मेरी मोहब्बत उसे तड़पेगा यूं ही याद करके मुझे रोने तड़पने से वापस न मिलूँगी कर लो अभी कदर फिर न मिलूँगी !!
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एक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत  गुम है गुम है गुम है  सो साद मुरादी सोनी फबत  गुम है गुम है  हो सूरत उसदी पारियों वरगी  सीरत दी ओह मरियम लगदी हंसदी है तान फुल झरदे नी  तुर्रादी है तान गजल है लगदी  लाम सलामी सारू दे कद्द दी है  एक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत  गुम है गुम है गुम है  सो साद मुरादी सोनी फबत  गुम है गुम है !!
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गतांक से आगे रिया तू मुस्करा यह दर्द सहना आसान नहीं है, इस दर्द में जीना आसान नहीं है, वो दर्द जो मैं सह रही हूँ, पल पल में घुट घुट के जी रही हूँ ,असहनीय है यह पीड़ा ! यह मुझे इस कदर तड़पा रही है, बेतरह रुला रही है मुश्किल सा हो गया है जीना ! न जाने कैसे यह दे दिया तुमने मुझे ? क्या तुम्हारा दिल जरा भी नहीं दुखता, जब मैं रोती हूँ तो क्या तुम्हारी आँख से एक आँसू भी नहीं टपकता ? गुजार देती हूँ सारी रात यूं ही बिना पलक झपकाए तो तुम कैसे बेफिक्र नींद सो जाते हो ?  प्रिय मुझे इस दर्द में अपना थोड़ा सा सहारा दो, ताकि मैं इसे सह सकूँ ! जी सकूँ ! भले ही न खिलखिला कर हंस पाऊँ लेकिन मुस्करा तो सकूँ ! वे शब्द जो दिल चीर देते हैं दिल के पार निकल जाते हैं ! और दे जाते हैं इतना गहरा ज़ख्म, ज़ख्म के ऊपर एक और ज़ख्म ,जो बहुत टीसते हैं ! बहुत रुलाते हैं और छीन लेते हैं सारा चैन और सकूँ ! मेरे प्रिय तुम एक बार तो महसूस करो मेरा दर्द, मेरी तकलीफ तब शायद तुम्हें अहसास हो कि  मेरा दर्द कैसा है ? क्यों है ?  मेरे आँखों के आंसुओं की पवित्रता को समझो ......क्या तुम कभी जान पाओगे इसके पीछे ...
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गतांक से आगे रिया तू मुस्करा यह सांस कैसे आ रही है? यह धड़कन कैसे धड़क रही है? कभी कभी यूं ही तो महसूस होता है, न जाने क्यों होता है ? पर होता है ! बेजान सा जिस्म जब कोई भी हरकत करने से मना कर देता है, तब ये टूटी फूटी उखड़ी उखड़ी सांसें हमें ऐसा ही अहसास करती हैं ! न जाने वो कौन सा गुनाह, ना जाने वो कौन सा अपराध हुआ है जिसकी यह सजा है कि जीवित होते हुए भी जीवित होने का अहसास नहीं होता ! ऐसे किसी भी पल में मैं तुमसे गले लगने को आतुर हो उठती हूँ ......अपनी आंसुओं से भरी आँखों के साथ अपने दोनों हाथ हवा में उठा कर, मेरे मुंह से सिर्फ दो ही शब्द निकलते हैं ,,,आखिर मेरी क्या गलती थी प्रिय ?  लेकिन फिर अपने लब सी लेती हूँ क्योंकि मैं तुम्हें कोई भी तकलीफ कैसे दे सकती हूँ जब मैनें तुम्हें सिर्फ खुशी देने का अनकहा प्रण ले रखा है ! हर हाल में हर तरह से वो सारी खुशियाँ जो तुमको चाहिए !  क्या हुआ अगर मैं जीते जी मर भी रही हूँ सिर्फ इसलिए क्योंकि हम सच हैं न और हमारा प्रेम एकदम निश्चल ! जिसमें न खोने का गम न पाने की लालसा सिर्फ प्रिय की खुशी! इसके साथ ही यह विश्वास भी कि तुम हर तकली...
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एक रंग अब एक रंग में रंग गए हम दोनों दूध औ पानी सा मिल गए हम दोनों बह ती जब हवाएं आ ती खुशबु हमारी फूल और खू शबु सा रम गए हम दोनों     मुझ पत्थर को छूकर पारस कर दिया जन्नत में जीने लगें हैं हम दोनों हारी मैं जी ते तुम न कोई सौदेबाजी जीत हार का जश्न मनाएं हम दोनों भीग जाऊ मैं कितना भी गोते लगाकर लहर और सागर सा बन गए हम दोनों बुना जो ख्वाब हमने संग मिलजुल कर हाथों में डाल हाथ जी जाएँ हम दोनों !! सीमा असीम  
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ओ रब ओ मेरे रब मुझे ये बता क्या मैं सच में प्रेम पाशित हूँ  क्या है वो जो मेरे भीतर बहुत गहराई तक जो किसी फिल्म की तरह चलता रहता है  ऐसा क्या है जो टूटता है बिखरता है  और रुला देता है किसी बच्चे की तरह फूट फूट कर  या खुशी से कर देता है दीवाना जरा सी बात पर कैसे छोड़ दिया है सब कुछ न जाने क्या खिलता  है मेरे मन के भीतर  न जाने कैसी घुटन होने लगती है अचानक से मुझे कैसे उछलने लगते हैं यूं ही सबके सामने अल्हड़ की तरह  सिर्फ अपने प्रिय की खुशी की खातिर न्योछाबर कर देते हैं जहां की खुशियाँ  नूर सा बरस पड़ता है चेहरे पर  हीरे सा चमक उठता है तन मन  न जाने कहाँ चली गई है मेरी अक्ल  न जाने क्यों पागल दीवानी सी बनी फिरती हूँ  ताकती हूँ उस आसमां को जहां खिले हैं खुशियों के फूल  ओ रब गर मैं हूँ वाकई प्रेम में तो  हमें बस प्रेमी ही बने रहने देना मेरे प्रिय को सारी खुशियाँ देना  सह लूँगी सारी सजा अकेले ही  रो लूँगी ऐसे ही दुखी होकर बस इस रिश्ते को कोई नाम न देना  हमें सिर्फ उसके प्रेम मे...
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कहाँ दूर तुमसे जब तुमसे दूर जाने का पल करीब होता है तब जी चाहता है ठिठक जाये ये पल न गुजरे ये लम्हा तुम्हारी आँखों मे डूबते उतराते ही व्यतीत हो जाये ये जीवन क्या तुम्हें पता है जब मैं तुमसे दूर जाने की सोचती भी हूँ जैसे बेढ़िया सी पढ जाती हैं मेरे पावों में   हवाएँ तुम्हारी ओर खींचे लिए चली आती हैं एक साथ होना तुम्हारा मन को इतना हल्का फुल्का कर देता है कि बस आसमान में ही विचरता रहता है दूर होने के अहसास भर से ही ये मन भरा भरा सा हो जाता है मन चाहता है तुम्हें इस तरह से मन में बसा लूँ कि दूर जाने पर भी क्षण भर को भी तुमसे दूरी का अहसास न हो !! सीमा  असीम