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Showing posts from 2022

बरेली

  झुमका सिटी, बांस बरेली, नाथ नगरी, आला हजरत की नगरी के नाम से मशहूर बरेली शहर एक महानगर है, यह भारत की राजधानी दिल्ली और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बीचो-बीच है,,, दिल्ली से 250 किलोमीटर के लगभग और लखनऊ से भी 250 किलोमीटर दूर है तो दोनों की दूरी बराबर है और बरेली दोनों के  बीच में ही पड़ता है,, बहुत ही प्यारा शहर बरेली उत्तर प्रदेश का आठवां सबसे बड़ा शहर है,,,   बडे कवि लेखक उधर है जैसे कि निरंकार देव सेवक जी,, जो बाल कवि थे,  चंदा मामा दूर के जैसी कविता लिखी,  जो हर बच्चे बच्चे की जवान पर रहती है,  चंदा मामा दूर के पुए पकाए बूरके जैसी कविताएं लिखी और उन्होंने पूरे भारत का नाम रोशन किया वह विदेशों तक में वह फेमस है प्रसिद्ध है उनको लोग जानते हैं जैसे प्रियंका चौपड़ा, दिशा पटनी आदि ,,   बरेली शहर भारत का एक ऐसा शहर है जो एक गाने की वजह से  लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है, बहुत पुराना गाना झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में इसकी वजह से आज तक लोग बोलते हैँ कि कहां गिरा था कहां गिरा था,,,  मुझसे अक्सर लोग पूछते  हैँ अगर मैं कभी कही...

Khush rhna

मेरी आंख में आंसू है तो क्या हुआ तुम सदा खुश रहना  दर्द ही दर्द हैं दिल में तो क्या हुआ तुम सदा खुश रहना  सच्चे मन से मांगती हुई दुआ रात दिन तुम्हारी ख़ुशी के लिए  छुए ना कोई आज के बाद तुम्हें कोई गम तुम सदा खुश रहना..  सीमा असीम

तेरे लिए

  खुश रहे तू आबाद रहे जहां भी रहे बस याद तुझको इतना रहे कि कोई जीता है सिर्फ तेरे लिए। होगी कबूल मेरी दुआ यकीन है मुझे तू रहेगा मेरा सदा जहां भी तू रहे  कि जीती हूं मैं सिर्फ तेरे लिए तेरे लिए सिर्फ तेरे लिए।।। असीम 

निर्मल

  कितना निर्मल जल होता है दरिया का उसमे कहीं कोई मिलावट नहीं कोई कुछ नहीं साफ एकदम... न जाने कहां से पथरीले पत्थर जैसे घृणा द्वेष नफरत आ जाते हैँ और फिर हमें जख्मी करते रहते हैं... हां यही तो होता है अक्सर जब हम प्रेम में होते हैं तो एकदम निर्मल दरिया की तरह एक दूसरे के साथ प्रेम की बाहों में मगन होकर बहते रहते हैँ...  फिर धीरे-धीरे करके नफरत घृणा और द्वेष के पत्थर आने लगते हैं प्रेम के दरिया में और फिर हमारे मन को आत्मा तक को जख्मी कर देते हैं.... इन पत्थरों से जो जख्म हो जाते हैं वह नासूर की तरह रिसते रहते हैं, इतना दर्द होता है, इतना दर्द होता है कि आंसू रोके ही नहीं रुकते किसी भी तरह से, किसी भी हाल में हम   अपने आंसुओं को रोक ही नहीं पाते हैँ यह बहते रहते हैं दर्द से बोझिल होकर,,,   निर्मल पवित्र बेबस से बेचारे आँसू....  असीम 

निष्ठुर

 कैसे हो जाते हो तुम इतने निष्ठुर   कैसे इतने कठोर हो जाते हो  क्यों आ जाता है तुममें अहम   क्यों तुम  इतने बेदर्द हो जाते हो  हां अक्सर यही सवाल तो मेरे दिल में होता है मैं सोचती रह जाती हूं कि तुम इतने मुलायम कोमल निर्मल नदी के सामान बहते हुए थे जो हर समय मेरे आस-पास रहते थे....  मंडराते रहते थे किसी बादल की तरह और बरस जाते थे अभी आसमा की झुक जाते थे.. फूलों सी मुस्कान बिखेर देते थे मेरे आस पास... खिला खिला  रहता था मेरा मन मेहकता हुआ जादुई एहसास से भरा रहता था  कभी कोई मन में  नफरत घृणा द्वेष ऐसी कोई बात नहीं..  जानती ही नहीं थी यह भी कोई शब्द होता है फिर कैसे क्या हो गया इतना नरम कोमल मुलायम दरिया जैसा  तुम्हारा दिल एकदम कठोर पर्वत की तरह हो गया   क्या तुम्हें लगता भी नहीं कभी क्या तुम कभी सोचते  भी नहीं  मैं बहुत दुखी हूं   ऐसा क्यों आखिर क्यों?

याद

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  यूं ही तो नहीं आती है मुझे उसकी याद  वह भी तो हमें यूं ही याद किया करता होगा  कहां भूल पाता होगा पल भर को भी मुझे  हर आती जाती सांस से मेरा नाम लिया करता होगा  भेजता होगा पैगाम ए मोहब्बत  कभी हवाओं से कह कर  कभी घटाओ से कह कर  कभी फिजाओं से कहकर  अकेले में घंटों बैठकर गुजार दिया करता होगा दूर तक बिखरी हुई वादियों में बैठकर  जोर से मेरे नाम की आवाज लगाया करता होगा  कभी नदी के किनारे बैठ कर देखता होगा जो अपनी परछाईं   तो मेरी अक्स पा लेता होगा  अंजलि से पकड़ने की कोशिश करता होगा अगर  तो पर उसके हाथ में कुछ भी नहीं आता होगा  अश्कों से भिगो लेता होगा अपना चेहरा  अपनी आत्मा को भी धोकर पवित्र कर लेता होगा  बस यूं ही दिन रात वो भी मुझे याद किया करता होगा  हर आती जाती सांस से मेरा नाम लिया करता होगा.. सीमा असीम .  असीम 
  करीब 1 घंटा हो गया था लेकिन अभी तक सुमित का कहीं अता-पता नहीं था कहां चली गई थी देर हो गई अभी तक वापस क्यों नहीं आए मन बहुत घबरा रहा था ऊपर से भी वही पढ़ रही थी मानो वह चढ़ती चली आ रही थी मैं तो कितने किनारे से खड़ी हुई थी फिर भी एक शो का सहारा था और आप तो चला जा रहा था लग रहा था सब को बड़ी जल्दी हो रही है और ऐसा लग रहा था कि सारे ही लोग निकल कर सबको अपने इस मेले में चले आए हैं मेरे पास गाड़ी की चाबी थी और मैं वहीं पर बैठी हुई थी लेकिन मुझे इतनी हिम्मत नहीं हो रही थी कि इस भीड़ में से गाड़ी को निकाल कर बाहर चले जाओ और वहां पर कट अकेला गाड़ी को खड़े छोड़कर जाना भी सुरक्षित नहीं था कि पुलिस वाले बहुत सारी वहीं पर खड़े हुए थे लेकिन बेबी कितना कंट्रोल करते हैं क्योंकि बैंक का एक रेला था इस मेले में मैंने तो शायद अपनी जिंदगी में इतनी भी पहली बार देखी थी इतने लोगों का हजूर जैसे भी सब एक-दूसरे को पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाना चाहते थे शायद वह सबसे पहले जाकर उस मेले में खरीददारी कर लेना चाहते थे दुकानों पर खड़े होकर सब चीजें देख लेना चाहते थे ना जाने उनके मन में कैसे जिज्ञासा थी मेला देखने आए...
 बहुत दुःख होता है  जब कोई भरोसा तोड़ता है  जीने का मन नहीं करता  इतने बुरे लोग क्यों बनाये तूने ईशर 
  चलो मां मैं कल चली ही जाती हूं जब भी तो इतना कह रही है आज आप फिर इतने दिनों के बाद हमारा संग साथ होगा तो अच्छा लगेगा लेकिन एक बात सुनो मैं पैकिंग तो कर लेती हूं 2 दिन का प्रोग्राम है पर आप कुछ खाली मैं परेशान नहीं होगी और कुछ बनाएंगे नहीं जाकर हमेशा किचन में खड़ी रहती हैं कुछ ना कुछ बनाने के लिए आशियाने खुश होकर मां से बात हुई थी ना जाने कितने दिनों के बाद उसके मन को थोड़ा सा सुकून से आया था कहीं जाने में बाहर निकलने में लोगों से मिलने के बाद मन तो अच्छा होता ही है और जब विचार ही आया जाने का तभी इतना अच्छा लग रहा है
बड़ी आसानी  से मुझसे नजरें चुरा लिया  दिन रात मेरी आँखों मेँ नमी घिरा  दिया  झूठ को सीने मेँ दबाकर कहाँ जाओगे तुम  मन को दुःख देकर मुझे बेचैन कर दिया 
  जी चाहता है सारी दुनिया में ले आऊं तबाही  भोले बाबा की तरह अपना तीसरा नेत्र खोल दूँ  इतना घबराता है जी कभी-कभी  कितना भी रो लूँ  पूरा नहीं होता  कुछ भी करने को दिल चाहता है  पूरी दुनिया से पानी पानी सिर्फ पानी  सिर्फ पानी भर देने को जी चाहता है   पूछना चाहती हूं मैं ईश्वर से एक बार मिलकर  अगर तूने  दुनिया बनाई है यह दूनिया तो  तूने अच्छे इंसान नहीं बनाये  कुछ तो आंखों में इंसान की शर्म दी होती  कुछ तो आंखों में दर्द दिया होता  छल कपट प्रपंच रचने के अलावा  कुछ तो इंसानों के अंदर इंसानियत होती   ईश्वर मैं तो सिर्फ यह पूछना चाहती हूं सिर्फ  कि तूने मुझे इतने दुख क्यों दिये   कि मेरी आंखों के आंसू थमते नहीं हैं असीम 
 कहाँ हो आर्यन तुम  और बिना बताए कहां चले गए चंपारण वापस आ जाओ वरना मैं मर जाऊंगीमेसेज करने के बाद मन को थोड़ा सकून आया कि  अब  उसका आर्यन वापस आ जायेगा क्योंकि यह पढ़ने के बाद वो मेरी स्थिति समझ जायेगा  उसी समय उसका फोन की घंटी बज उठी है और वह अपनी तरह से तुमचा से बाहर निकल आई है क्योंकि वह तुम्हारे ख्यालों में खोई हुई थी उसका फोन तो नहीं है किसका फोन है वह जल्दी से फोन का बटन दबा कर बात करने लगी कल तू आ रही है सैया हम लोगों को सुबह जल्दी निकलना है भाई और हम और तुम तीनों चल रहे हैं वहां पर हम लोग बहुत मजे करेंगे कितने दिनों के बाद साथ जाने का मौका मिला है और तू ऐसा कैसे कर सकती है कि ना जाए तो जा रही है हमारे साथ हर हाल में कोई बहाना नहीं चलेगा बड़े दिनों के बाद तो हाथ लगी है और तेरा साथ मतलब खुशियों का भंडार तो तू जहां भी रहती है बस खुशियां ही खुशियां होती है लेख लेकिन तुम मुझे अब पहले जैसी नहीं लगी तो कल बड़ी उदास निराश और हताश थी क्या हुआ है तो मुझे बताना मैं तो तेरी ही हूं तेरी सहेली तेरी अपनी तेरी सब कुछ हां हां यार मैं सब पता होगी तो इतनी सारी बातें करेगी ए...
 जिंदगी तू बड़ी प्यारी है और बड़ी खूबसूरत है क्योंकि तू है सिर्फ और सिर्फ हमारी... 
 na जाने क्यों आदत सी हो गयी है  हर किसी को हर बात पर शक सुबह करने की  लोग तो अक्सर इश्वर पर भी शक करने लगते हैं  समझते ही नहीं कि जो इश्वर करता है या  कर रहा है वो हमारे भले के लिए ही कर रहा है  जो कुछ भी वो करता है  उसमें हमारा कुछ न कुछ अच्छा ही हो रहा होता है की भी हमारे साथ अगर कुछ भी गलत करता है तो  उसका अंजाम उसे खुद ब खुद जरुर मिलता है  तो फिर हम क्यों उस पर ऊँगली उठाते है   क्यों उसे गलत ठहराने के लिए कमर कस लेते हैं  और हर तरह से नीचा दिखने का प्रयास करते हैं  उसके लिए हमें चाहें कितने भी साम भेड़ क्यों न अपनाने पड़े  आखिर उसे गलत साबित कर देते हैं तभी सकूं पाते हैं  जबकि जो गलत करता है  वो खुद ही उसकी सजा भुगत रहा होता है अपने मन ही मन में  हमें तो विश्वास रखना है सिर्फ खुद पर  और अपने इश्वर पर फिर  चाहें कोई कुछ करे हमें कोई भी फर्क नहीं पड़ने वाला है  हमें मस्त रहना है  खुश रहना है  बहुत हुआ अब  जियो शान से और दिखा दो दुनिया को कि  हमारे साथ ईश्वर है  वो...
  कभी-कभी हम मजबूर होते हैं बेइंतिहा मजबूर होते हैं   हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते लेकिन  हम भले ही कुछ नहीं कर पाते या  नहीं कर रहे होते हैं  पर हमारा ईश्वर जो सब देख रहा होता है  वो अंदर ही अंदर हमारे भले के लिए कर रहा होता है  जैसा हम चाहते हैं उससे भी कहीं ज्यादा  एक सुंदर संसार रच रहा होता है और जब ईश्वर करता है न  तो फ़िर सारी दूनिया सिर्फ भौचक होकर देखती रह जाती है..  क्योंकि तुम किसी की सरलता का फायदा उठा कर उसे यूँ फेंक देते हो न  उस वक्त ईश्वर अपनी बाँहों का सहारा दे देते हैं और हर तरह से संभाल लेते हैं...  सीमा असीम 
  हे ईश्वर देखो ना  कितनी बारिश हो रही है आसमान से और  उतनी ही बरसात हो रही है मेरी आँखों से  मैं अकुला जाती हूं  घबरा जाती हुँ  सोते से जगकर बैठ जाती हुँ   ढूंढने लगती हूं तुम्हें  यहां वहाँ  जहां-तहां  कितनी पागल हो ना मैं  मूर्ख हूं पूरी की पूरी  जब रहते हो मेरे मन में तुम और  तुम्हारे मन में मैं तो क्यों ढूंढने लगती हूं तुम्हें  कहीं भी किधर भी...  सीमा असीम 
  मैं रहती हूं तुम्हारे दिल में  नहीं जा पाती हुँ पल भर को भी दूर कहीं तुम से  जहां तुम वहाँ मैं और  जहाँ मैं वहाँ तुम    संग संग रहती हूं मैं सदा तुम्हारे  जब तुम साँस लेते हो ना  तभी मैं सांस लेती हूं जब तुम हंसते हो तब मैं हँसती हुँ और  जब तुम रोते हो तो संग संग रो देती हुँ  मैं तुम्हारे   खाते पीते सोते जागते हरदम तो तुम्हारे साथ रहती हूं  बताओ भला  दिल से भी किसी को कहीं निकाला जा सकता है क्या  कभी नहीं ना, कभी भी नहीं  यह तो संभव ही नहीं है कि जुदा हो सके मेरी आत्मा से कभी तुम्हारी आत्मा...  सीमा असीम 
  हे ईश्वर मैं तुम्हें प्रेम करती हूं  बहुत ज्यादा प्रेम करती हूं  बेइंतेहा प्रेम है मुझे तुमसे  तभी तो तुम रहते हो मेरे मन में  और हां मैं इतना भी जानती हूं कि मैं रहती हूं   तुम्हारे दिल में सिर्फ तुम्हारे मन में सीमा असीम 
  हां मैं तुम्हारा इंतजार करती हूं  हर पल में हर क्षण में  अपनी हर आती-जाती सांस के साथ  मैं तुम्हारा नाम लेती हूं  हां मैं जानती हूं कि तुम मेरे हो सिर्फ मेरे ही  तभी तो मैंने तुम्हें जाने दिया बहुत दूर तक जाने के लिए मैंने बहुत बड़ी ढील दे दी तुम्हें  लेकिन सुनो तुम कहीं जाकर भी तो नहीं जा पाए  तुम जा नहीं सकते कहीं क्योंकि तुम तो सदा वही हो  जहां मैं हूं यहां जहां मेरी सांसे हैं और जहां मेरी आत्मा है  हां तुम्हारी उड़ान बस उतनी ही तो है जहां तक मेरी आत्मा जाती है  फिर भी मैं करती रहती हूं तुम्हारा इंतजार हर पल हर क्षण ना जाने क्यों ना जाने क्यों...  सीमा असीम 
  सजानी थी मुस्कान मेरे चेहरे पर पर तूने मेरी आँख में आंसू भर दिए   इतने गम ही गम दिये और जिस्म में जख्म भर दिये  तुझे क्यों खयाल ही नहीं आया एक बार भी मेरा   मैंने तो दी थी तुझे हमेशा खुशी ही ख़ुशी और तुमने मुझे दर्द दे दिए  तड़प जाती है दर्द से रूह मेरी आत्मा तक, तूने इतने घाव दे दिये  तुझे तो समझा था मैंने सिर्फ अपना ही अपनेपन के बदले तूने मुझे ऐसे कैसे सिले दे दिए  काश कि तेरे जिस्म में होता एक मासूम सा प्यारा दिल भी  तो दिमाग से ही न सोचता, सोचता कभी दिल से भी  न करता हर जगह दिमाग का ही प्रयोग तो आज मेरी आंखों में आंसू ना होते और मेरे चेहरे पर मुस्कान सजी होती क्योंकि मुझे मिलता प्रेम के बदले प्रेम अपने पन के  बदले में अपना पन  त्याग के बदले में त्याग और समर्पण के बदले में समर्पण  कोई बात नहीं वक्त तो सबका आता  है वक्त कहां ठहरता है भला,  वक्त कभी कहीं नहीं रुकता है वो तो चलता ही रहता है अपनी रफ्तार से और जो आज तू कर रहा है मेरे साथ कल को तेरे साथ भी शायद यहीं होगा तू भी तड़पेगा रोएगा   और तेरी...
  कुछ इंसान अपने चेहरे पर ना जाने कितने चेहरे लगाए रहते हैं समझ में नहीं आता कि उसका असली चेहरा कौन सा है हां मुझे लगता है तुम भी तो ऐसे ही हो क्या मैं सच हुँ  या गलत ? क्या मैं सही हूं यह मैं झूठ ? अगर मैं सही हूं तो  मैं तुम्हारे चेहरे को इतना देर से कैसे पहचान सकी ? वैसे मुझे तो पहले ही समझ आ गया था लेकिन  वह कहते हैं ना कि झूठे को अंत तक  पहुंच जाना चाहिए ! हां मैं अंत तक पहुंचाना चाहती थी मैं देखना चाहती थी अंजाम!  हां इसमें बहुत सारे दुख थे,  कष्ट थे, तब भी  मुझे खुशी है कि मैं तुम्हें पहचान तो सकी, तुम्हें पहचानना खुद को पहचानना नहीं था ! वह तो सिर्फ तुम्हें पहचाना था ! खुद को पहचानने के लिए मैं खुद में उतरी और आज मैंने खुद को पहचान भी लिया कि मैं सच हूं और हमेशा सच ही रहूंगी और मेरा मन हमेशा सच्चा पवित्र ! इसे कोई भी नहीं झुठला सकता इसे कोई भी नहीं खत्म कर सकता ! मैं सच्ची हूं और सच्ची ही रहूंगी....   निर्मल पवित्र आत्मा से मनन चिंतन और लगन लगाए रहूंगी...  हो जैसे भी हो तो आखिर मेरे ही, हां सिर्फ मेरे...  असीम 
 अपनी तारीफ़ खुद ही करते हो गलत को भी सच साबित करते हो कितने स्वार्थी हो तुम अब समझी हूं एक चेहरे पर कई चेहरे लगाया करते हो उफ्फ ऐसे हो तुम क्यों नहीं जाना पहले शर्म न लिहाज जरा भी तुम्हें क्या झूठ को सच क्यों बनाते फिरते हो काश कि आए थोड़ी तो लिहाज तुम्हें अपनी गलतियों का अहसास हो तुम्हें।।
 मुझे लगता है कि जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है क्योंकि ईश्वर ही सब करते हैं,अतः किसी भी काम को अपने हिसाब से न होने पर हमें हताश या निराश नहीं होना चाहिए।। बस अपने मन में हमें हमेशा यह भाव रखना चाहिए,जो भी होगा सब बढ़िया ही होगा।। असीम २४,९,२२
 तेरा पेट वाकई बहुत बड़ा है  कभी भरता ही नहीं है    खूब लुटा जी भरकर  तन मन और धन से  फिर हाथ पाँव काट कर  दूर फेंक देता है  कि तुझे कभी छू तक न न पाए  बड़ा बेशर्म शख्स है  किसी भी बात का कोई असर नहीं है  हो भी कैसे  आखिर तेरे संस्कार ही यही हैं न  बर्बाद करना और खुद ख़ुशी मनाना  लेकिन याद रखना उसकी लाठी बेआवाज होती है  जो ऊपर बैठा सब देख  है  याद रखना उसके दरवार में देर जरुर है  पर अंधेर बिलकुल भी नहीं  तू भी रोयेगा  और तेरे आंसूं पोछने वाला कोई नहीं होगा  खून के आंसू रोयेगा तू  जैसे तूने आँखों में भरे हैं हमारे  किसी को दगा देने का मतलब  एक दिन जरुर समझ आ जायेगा  तुझे  जब तू तडपेगा गिद्गिदायेगा  पर ढाढ़स बढाने वाला दूर दूर तक कोई नहीं होगा  तब शायद हमारी रूह को तसल्ली मिलेगी  और तुझे भी अहसास होगा किसी को यूँ  दगा देकर धोखा देकर बर्बाद कर देना  क्या अंजाम होता है ..... असीम 
कहाँ जाओगे तुम दूर मुझसे कभी   जब नस नस में हो तुम ही बसे  याद करने की जरूरत नहीं मुझे  भुलाए नहीं जा सके हो कभी  अश्कों में दिखता है अक्स तेरा  नहीं गिरने देती गालों से नीचे कभी  पल पल में नाम तेरा जुबान पर  पुकारने लगता है जब चाहें कभी  नहीं जरुरत अब तन की मुझे  समाये हो तुम ऐसे मुझमें कहीं...... सीमा असीम  
 छल कपट प्रपंच से अगर किसी को अपना बना लिया तो क्या फायदा  बनाना है अगर किसी को अपना तो उसका दिल जीत  कर दिखाओ  माना कि हो तुम बहुत धुँर्न्धर किसी का भी दिल और मन  तोड़ देने में  कभी तो बहते हुए मेरे आंसुओं को जरा तुम पोंछ कर तो दिखाओ   तब नजर आयेगी तुम्हारे  इंसान होने की  इंसानियत जरा सी ही सही  आकर अपने  किये वादे और अपना फर्ज निभा कर तो दिखाओ   असीम 
 सच्चे दिल की सच्ची हूं रहुंगी भी सदा तू हैं गलत तो रहेगा गलत ही रहेगा न  असीम 
तेरी खुशी को रात दिन दुआएं की मैंने तूने ही रुला दिया मुझे जी भरकर बेशर्म असीम
तू क्या जाने भला, तू कैसे समझेगा भला तू तो स्वार्थ में भरा हुआ एक स्वार्थी  इंसान है जिसे दिखाई देती है सिर्फ अपनी खुशी दूसरे को दर्द देने के बाद तू और खुश होता है.... अब तू मौत को तरसे इतना जये कि धरती त्राहि त्राहि कर उठे 
 तुम जानते थे मेरी मोहब्बत फिर   दीवानगी की हद तक  तुमको मुझसे मोहब्बत हुई ,,,
 तुम्हें कहां किसी बात का कोई असर होता है तुम तो वहीं करते आए हो जो तुम्हें अच्छा लगता है और मुझे दुख देना तुम्हारा बहुत पुराना शगल है 
तू एक नंबर का दोगला इंसान है विश्वास को तोड़ने वाला विश्वासघाती  देख विश्वास कैसा टूटता है  इस दुनिया में जीने लायक ही नहीं है तेरा अंजाम तो मैं अपनी आंखों से देख लूंगा क्योंकि देर जरूर होती है लेकिन अंधेर कभी भी नहीं होता  
 यह जीवन है इस जीवन में अनेक तरह के लोग मिलेंगे लेकिन हम तो एक ही है ना तो हमें बस अपने आपको अपने जैसे बना कर रखना है किसी अन्य की तरह बनने से कोई फायदा कहां होता है सिवाय तकलीफ के 
 तेरी हर बात से मैंने कुछ ना कुछ सीखा ही है तेरा धोखा देना भी मुझे बहुत कुछ सिखा गया है सच मान तू अपनी ही नजरों में गिरा हुआ एक शख्स है जो कभी अपने से भी नजर नहीं मिला सकता ....

कथनी करनी

 दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं जो कहते हैं वही करते हैं और जो नहीं कहते हैं वह नहीं करते लेकिन ऐसे भी लोग होते हैं जो कहते हैं वह कभी करते नहीं और जो करते हैं वह कभी करते नहीं ऐसे ही तो नहीं कहा जाता कथनी और करनी में अंतर 

तुमसे

 तुझसे कुछ कहने से अच्छा है मैं खुद से ही कह लिया करूं  समझा लिया करूँ खुद को ही खुद से कि फायदा ही क्या है  तुमसे कुछ कहने का सुनने का  मैंने तो सुना था कि कुछ कहे  बिना ही  हम एक दूसरे से कह सकते हैं अपने मन की बातें  सुन सकती है एक दूसरे के मन की बातें  क्यों नहीं सुनाई देती मेरी बातें  या फिर तुम सुनकर भी अनसुना करते हो मुझे  मेरी आत्मा पुकारती है जब तुम्हें ना  समझो पूरी पृथ्वी की डोल जाती होगी  आकाश भी गरज के बरसने लगता होगा बादल बंन कर  और भिगो देता होगा पूरे ब्रह्मांड को अपने पानी से जैसे मैं भिगोती हूँ खुद को आंसुओं में तरबतर करके.... सीमा असीम 

कारोबार

  कहाँ होती होंगी उसे तकलीफ या दर्द होता होगा जिनका धंधा है यही जिनका कारोबार है यही.. उसे क्या फर्क पड़ता होगा मेरी जाँ निकलने से उसने तो सब सोचसमझ कर किया होगा बहुत चतुर दिमाग़ है उस एहसान फरामोश के पास  दिल का उसके जिस्म में कहीं नामोनिशान नहीं होगा  स्वार्थ से भरा हुआ सिर्फ फायदा ही देखता रहा अपना  मतलब निकलते ही  पहचानना भूल गया होगा मत रो अब सीमाउसको याद करके रातदिन

नयी कविता

 अब तुम ही बताओ मुझे कि कैसे दूर जाएँ हम तुमसे  जहाँ भी जाती हूँ तुम वहीँ पर आ जाते हो  जिस किसी को देखूं तुम ही दिख जाते हो  और तो कोई नजर आता नहीं है  सिवाय तुम्हारे सिर्फ तुम ही तुम  तुम फूलों में पत्तों में पौधों में  हर जगह पर बस तुम्हारा ही अक्स  जागती आँखों में भी और सोने के बाद ख़्वाबों में भी  क्यों नहीं जाते तुम पल भर को भी मुझसे दूर  क्या तुम्हें मैं इस कदर याद आती हूँ कि  हर वक्त मन मस्तिष्क में चिपके रहते हो  या यूँ कहें कि बादलों की तरह मुझ पर छाये रहते हो  आकाश की तरह झुके रहते हो  बारिश हो जाए गर कभी  तो हर बूंद में तुम ही तो होते हो और खिंच लेते हो यूँ चुम्बक की तरह  मुझे बारिश में भीगने के लिए और  कर देते हो मुझे तरबतर अपने ही अक्स से  तब सुनो मैं मैं नहीं रहती मैं तुम बन जाती हूँ  सिर्फ तुम ही तुम  मैं कहीं भी नहीं ......... सीमा असीम सक्सेना  १६,६,२२ 

कविता

अब तुम ही बताओ मुझे कि कैसे दूर जाएँ हम तुमसे  जहाँ भी जाती हूँ तुम वहीँ पर आ जाते हो  जिस किसी को देखूं तुम ही दिख जाते हो  और तो कोई नजर आता नहीं है  सिवाय तुम्हारे सिर्फ तुम ही तुम  तुम फूलों में पत्तों में पौधों में  हर जगह पर बस तुम्हारा ही अक्स  जागती आँखों में भी और सोने के बाद ख़्वाबों में भी  क्यों नहीं जाते तुम पल भर को भी मुझसे दूर  क्या तुम्हें मैं इस कदर याद आती हूँ कि  हर वक्त मन मस्तिष्क में चिपके रहते हो  या यूँ कहें कि बादलों की तरह मुझ पर छाये रहते हो  आकाश की तरह झुके रहते हो  बारिश हो जाए गर कभी  तो हर बूंद में तुम ही तो होते हो और खिंच लेते हो यूँ चुम्बक की तरह  मुझे बारिश में भीगने के लिए और  कर देते हो मुझे तरबतर अपने ही अक्स से  तब सुनो मैं मैं नहीं रहती मैं तुम बन जाती हूँ  सिर्फ तुम ही तुम  मैं कहीं भी नहीं ......... सीमा असीम सक्सेना  १६,६,२२ 

कविता

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 निर्मल झील में खड़े होकर  पल भर को आंखें बंद करके  इसकी गहराई की तरह  खुद में गहरे उतरते हुए  सोचा मैंने  जरूरी है सोचना भी कि   कितने विस्मयों से भरी हुई है यह पृथ्वी  कितनी खूबसूरती समाई हुई है इसमें..  सूरज चांद को तकते हुए या फूलों को निहारते हुए  अक्सर यही तो सोचती हूँ मैं कि खूबसूरती सारी हमारे मन में होती है  निर्मलता पवित्रता सारी हमारे मन से होती है  सारे अचंभे सारे विस्मय हमारे मन में होते हैं  अगर हम सच में महसूस कर सके तो  या फिर एहसासों में भर सके तो..... सीमा असीम

कबीर

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ? रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ? जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते, हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ? खलक सब नाम अनपे को, बहुत कर सिर पटकता है, हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ? न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से, उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ? कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से, जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?
 जब तुम कहते हो  बेहिचक मेरी कमियों को तो मेरी हिचक कुछ और कम होती है जैसे डूबता हुआ तारा  चमकने लगता है कुछ और ज्यादा ठीक वैसे ही मेरे बुझते चेहरे पर  मुस्कान कुछ और तेज होती है असीम

चाह

 हमें जिंदगी में वही मिलता है जो हम चाहते हैं  दिलों जान से जी जान से जोर लगा देते हैं जिस चीज को पाने के लिए वह हमें मिलकर रहती है  उसे कोई भी नहीं रोक सकता खुद ईश्वर भी हमारे आगे नतमस्तक होते हैं और वो सब दे देते हैं जो हमें चाहिए हमारी चाह में इतनी शक्ति होनी चाहिए कि कोई भी चीज उसे डिगा न सके... चाह सबसे बड़ा हथियार है जो अपना रास्ता खुद बना लेता है हमें हमारी चाह से वो सब मिल जायेगा जिसके हम हकदार हैं... हमारी चाह हमें मजबूत बनाती है कभी कमजोर नहीं पड़ने देती... चाह जिन्दा है अगर तो हम भी जीवित है चाह के मरते ही हम मरे हुए के समान हो जायेंगे... जैसे मेरी चाह है कि मेरे हो तुम, सिर्फ मेरे हो तुम और यह सच है कि तुम सिर्फ मेरे ही हो... सीमा असीम 

वक़्त

 मुझे बस इतना पता है  वक्त आता है सभी का एक दिन  हां जब मेरा वक्त आएगा  तो क्या मैं उन लोगों को सजा दे पाऊंगी  जिन लोगों ने मुझे बहुत सताया  रुलाया तड़पाया तरसाया   जिस्म से जान खींच ली हो इस तरह से   नस नस का सारा लहू निचोड़ लिया हो  मेरी सच्चाई के गवाह है मेरे बहते हुए आंसू  दिल में बेपनाह उठता  हुआ दर्द  जो किसी हाल किसी तरह नहीं समझता  बस बार-बार यही दुहाई देता है  ऐसा किसी के साथ ना हो मेरे दुश्मन के साथ भी ना  हो  जो किया तुमने  शर्म आती नहीं होगी ना तुम्हें जरा भी  काश होता तेरी आंखों में भी पानी  तो इस तरह कभी नहीं करता  समझता दर्द की कीमत  किसी को यूँ बर्बाद ना करता चल खुश ऱह तू और इंतजार कर वक़्त के बदलने का कि वक़्त नहीं रहता सदा एक जैसा.... काश पहले समझती मंशा तुम्हारी फिर यूँ अपनी जाँ न गवाई होती सिर्फ निभाना ही तो थी मंशा मेरी तुम्हें यह बात समझ आयी होती असीम 

काफल

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 चलो आओ जिंदगी को जीने चलते हैं लो तुम मेरा हाथ पकड़ो हम बहुत दूर तक चलते हैं तुम मेरा सहारा ले लेना  जब जरूरत पड़े तुम्हें ऊंचे नीचे रास्ते पर  वो देखो काफल पकने लगा है पहाड़ों पर  हरा हरा पेड़ लाल लाल फलों से भरने लगा है  तुम पके हुए काफल मुझे तोड़ कर दो न मैं स्वाद लेकर बताउंगी कि कैसा है अगर मीठा निकला तो तुम्हें खिला दूंगी अगर खट्टा हुआ तो खुद खा लूँगी  फिर लाल लाल काफल खूब सारे तोड़ कर अपनी झोली में भरकर ले आऊंगी कोई बात नहीं अगर पड़ गया कपड़ों पर धब्बा लाल सुर्ख लाल तो भी क्या हुआ लाल रंग तो प्रेम का प्रतीक है हैं न? यह लाल काफल हमें जीने  की सच्ची राह दिखा देंगे तो आओ चलो न  जिंदगी को जीने और काफल को खाने... सीमा असीम
सोचती हूँ कि दोगला क्या शब्द होता है  फिर मुझे लगता है दोगला वह होता है  जो कभी अपनी बात पर कायम नहीं रहता  कभी वह वफा नहीं कर सकता उसका धर्म होता है सिर्फ बेवफाई  अपने फायदे के लिए हर गलत काम करने वाला जो एक दिन खुद अपनी नजरों में ही गिर जाता है जब तक मतलब रहा साथ चलना फिर स्वार्थ के लिए किसी को मार देना उसका सबकुछ लूट कर बर्बाद कर देना बस यहीं काम होता है एक दोगले इंसान का सीमा असीम 

प्रेम

 जहां प्रेम होता है वहां किसी और चीज की कोई जगह ही नहीं होती  सिर्फ प्रेम होता है  क्योंकि प्रेम से बढ़कर कुछ और है ही नहीं  और प्रेम में सिर्फ प्रेम के कुछ और है ही नहीं   प्रेम होता है अगर तो सिर्फ प्रेम होता है  और प्रेम कभी बदलता नहीं है  प्रेम बस आता है जाता नहीं   जो है जैसा है वह वैसा ही हमेशा रहता है  तभी तो प्रेम है तो मैं हूँ और तू भी और तू और मैं मिलकर बन गए हम  हां हम एक हैं क्या दूर क्या पास हमेशा एक और रहेंगे सदा सीमा असीम 

आँसू हैं या लहू

 जब आँख से आँसू बहने शुरू होते हैं  तब बहते ही रहते हैं  रुकते ही नहीं हैं  मानों आँखों से कोई समुंदर फूट पड़ा हो  जो थमने का नाम ही नहीं ले रहा  ऐसा लगता है  जिस्म का सारा लहू आँखों से बह बह कर बाहर आ रहा है  और बेजान सा जिस्म एक तरफ को पड़ा रहता है  मैं सोचती हूँ कि तुम ऐसे हो अगर तो ऐसे क्यों हो  क्या तुम हम जैसे इंसान नहीं हो  क्या तुम्हारे अंदर कोई भावना नहीं है  कोई दर्द नहीं है  कोई तकलीफ का अहसास नहीं है  तुम कैसे कर लेते हो सब कुछ इतनी आसानी से  कोई मर रहा है अगर  तो तुम उसे यूं ही मरने के लिए छोड़ देते हो  इतने कठोर शब्दों का इस्तेमाल कैसे कर लेते हो  प्रेम के नाम पर नफरत फैलाने वाले काम कैसे कर लेते हो  क्या तुम्हारा कोई माँ बहन नहीं है  क्या तुम औरत को सिर्फ इस्तेमाल किए जाने वाली वस्तु मात्र समझते हो  सुनो हे निर्दयी मानव  तू कैसे तड़पा लेता है  तू कैसे रुला लेता है  क्या तू दानव है या राक्षस  तुझे जरा भी दया धर्म नहीं है  नोच खसोट के तन मन से बर्बाद...

दगाबाज

 जो दगाबाज होता है  कई रूप रखता है  असली चेहरा कभी नजर नहीं आता कई चेहरों के पीछे कहीं थोड़ा बहुत होता है वो खुद ही खुद को नहीं समझ पाता है इस कदर दगाबाज होता है खूब करता है वो चालाकियाँ खूब लूटता है वो कमजोर को और वो मजबूत से डरता भी है उसके आगे झुक भी जाता है पर याद रखना ओ दगाबाज एक कमजोर की आह सात आसमान चीर जाती है उसकी आह कभी खाली नहीं जाती है वो दर्द से तङप जाता है दग़ाबाजी की चाल से रो पड़ता है आँसू नहीं सूखते कभी उसके रात दिन रोता है तड़पता है आहें भरता है दुखी होकर बद्दुआ देता है सुन खोखले इंसान तू एक कमजोर की गाली ईश्वर को भी हिला देती है जब वो दुखी होकर पुकारता है कभी पुकार खाली नहीं जाती तू सुन दगाबाज तेरा अंजाम भी बहुत बुरा होगा तू इतना रोयेगा तड़पेगा पैरों में गिरकर गिड़गिड़ायेगा फिर भी तू सकूं नहीं पायेगा तुझे तेरी करनी का फल मिलेगा जरूर मिलेगा याद रख देर जरूर है पर अंधेर नहीं है जैसा किया है वही मिलेगा तुझे ओ दगाबाज असीम 
तन के बंधन तो तोड़े जा सकते हैं पर   मन के बंधन  कोई कैसे तोड़ सकता है भला  जो रिश्ते आत्मा से जुड़ जाते है   उन पर जन्म या मृत्यु का कोई प्रभाव कहां पड़ता है  जोड़े है हमने आपस में  आत्मा से आत्मा के तार  एक तार खींचता है तो दूसरे को महसूस होता है  दूसरा अगर जोर से खींचता है  तो पहला दर्द से भर जाता है  आत्मा का बंधन है  हां सच्ची आत्मा का  सच्चा बंधन.. असीम 
 अच्छा लगता है मुझे तुम्हारा खुश रहना  तुम्हारा मुस्कुराना  और बेपरवाह होकर खिल खिलाना  तुम तो जानते हो ना  तुम्हारी खुशी के लिए कितनी दुआएं  मन्नतें और सजदे किए  न हो तुम्हें कभी कोई तकलीफ  दुःख या दर्द इ सके लिए हमेशा परवाह की  तुम समझो ना समझो  मैंने तो सच्चे मन से  निस्वार्थ भावना से किया  जो मुझे सही लगा  वही सब किया  प्रार्थना में सिर्फ तुम्हारा नाम शामिल किया  कुछ भी कभी कोई गलत किया ही नहीं  अगर तुम गलत समझ बैठे तो क्या फर्क नहीं पड़ता   मेरा मन जानता है सच्चाई  और वो रब  जो ऊपर बैठा सब देख रहा है  वह भी सब जानता है  मैं हमेशा निर्दोष हूं  थी और रहूंगी भी  कभी बिना दोष के भी सजा मिल जाती है  सजा देने वाला क्या निर्दोष है  जो बिना किसी दोष के भी सजा देता है  उसे किसी भी पल चैन नहीं पड़ता इसलिए तुम खुश रहो बाकी उस रब पर छोड़ दो जो होगा अच्छा ही होगा  क्योंकि जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है हमारे भले के लिए ही होता है...  सीमा असीम...

करीब

तुम्हारे दुख में  मैं दुखी हो जाती हूं और तुम्हारे सुख में सुखी होती हूं  चाहे तुम दूर रहो या पास रहो  मैं होती हूं हमेशा तुम्हारे ही साथ  किसी ना किसी बहाने से यादों में बसा कर मैं तुम्हारे करीब हो जाती हूं  पुरानी यादों को सीने से लगाकर  बहुत पास आ जाती हूं  दूर होकर भी कहां दूर रहती हूं  मैं सिर्फ तुम्हारे पास होती हूं  जैसे फूलों से खुशबू कभी दूर नहीं होती  इंद्रधनुष से रंग   वैसे ही मैं तुमसे अलग होकर भी अलग कैसे हो सकती हूं  क्योंकि अगर मैं फूल हूं  तो तुम खुशबू हो  अगर तुम धनुष हो  तो मैं रंग  बस हम आपस में इसी तरह से गुथे हुए हैं फूल रंग और खुशबू की तरह  तो दूर रहकर भी करीब और  करीब रहकर भी करीब ही होते हैं...  सीमा असीम 

एक से हैं हम

 खुश होने में और खुश दिखाने में  बहुत अंतर होता है तुम दुःख देकर सुखी हो अगर तो मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूँ तुम दिल ही दिल में रोते होंगे जब दिल मेरा दुखाते होंगे खुश होने के लिए जरूरी है खुशियाँ बाँटना जो लेने से ज्यादा देने में विश्वास करते हैं वे हमेशा खुश और सुखी रहते हैं  अगर किसी राजा के राज में  सारी जनता बहुत खुश है और सिर्फ एक व्यक्ति भी दुखी है  तो वह राजा कभी सुखी और  खुश नहीं रह सकता  वैसे ही तुम सबको खुशी दे कर सुख दे कर भी   कभी खुश नहीं हो सकते  जब तक मैं खुश नहीं हूं  मेरा मन सुखी नहीं है  तुम कैसे हो सकते हो खुश या सुखी  क्योंकि हम से तुम हो और तुमसे हम  अलग नहीं है हम एक हैं और एक से है हम... सीमा असीम  असीम 
 मिलन में मन लगा हुआ था तो जरा सी टिक की आवाज से उसके वापस आने का भ्र्म हो रहा था, व्हाट्सप्प पर कोई मेसेज की आवाज सुनकर उसने झट से  मैसेज बॉक्स खोला, परी मिलन का मैसेज नहीं उसके भाई का मैसेज था उसने भाई का मैसेज पढ़ आपकी समय निकलोगे वहां से बस भाई अभी थोड़ी देर में निकलने वाले रिप्लाई भी कर दिया, ठीक है समय पर पहुंच जाना अरे यार जिसके मैसेज का इंतजार था उसका तो आया नहीं भाई का आ गया, चलो कोई नहीं मत आने दो पार्किंग कर लेती हूं निकलना भी तो है, स्पार्क्स की घंटी बजी तो देखा मिलन का इमेज बहुत प्यारी कविता लिखी हुई थी जान मेरे संग संग चल आया था मैं अकेला नहीं आया, प्रेम प्रेम कभी एक तरफ होता ही नहीं है दोनों तरफ से ही होता है लेकिन प्रेम मिलकर भी बिछड़ जाता है और बिछड़ कर भी मिल जाता है,

तुम और मैं

 जब मैं तेरे साथ रहती  तब मैं अकेली सी रहती थी  अब मैं दूर हूं तुझसे  तू भी क्यों हरदम इतने करीब रहती हूं  कि तुम रहते हो हमेशा मेरे साथ  मेरी परछाई बनकर मेरे आस-पास  कभी पल भर भी तो तुम दूर नहीं जाते हो मुझसे  एक पल को भी तो अकेला नहीं छोड़ते हो तुम मुझे  चलते रहते हो संग संग  बैठे रहते हो संग संग बातें करते रहते हो संग संग सो जाते हो तुम संग संग ख्वाबों में भी तो कहां दूर जाते हो तुम  कभी जगा देते हो अचानक से  तो भी तो पल भर को दूर नहीं जाते  मेरे एहसास हरदम तुम्हारे साथ रहते हैं  यूं कहो कि तुम एहसास बनकर सदा मेरे साथ रहते हो  कभी कहीं एक क्षण को भी तो अलग नहीं होते हो  क्यों आखिर क्यों क्यों रहते हो तुम मेरे साथ फिर खुद में कौन रहता होगा तुम्हारे   तुम अब तुम नहीं रहे हो  तुम मैं बन गए हो क्या  तुम्हें पता नहीं  जैसे मैं तुम बन गई हूं और तुम मैं बन गए हो असीम 

ख्वाब एक है

 क्या तुम जानते हो  क्या तुम्हें पता है  जीने के लिए  अनेकों ख्वाबों की जरूरत नहीं होती  सिर्फ एक ख्वाब ही काफ़ी है  जैसे काफी एक ही ख्वाहिश  तुमसे मिलने की  तुमसे बातें करने की  और तुम्हें देखने की  हां मेरी एक ही ख्वाहिश है और एक ही ख्वाब  वह है तुम  हां तुम ही हो मेरी ख्वाहिश  तुम ही हो मेरा ख्वाब सिर्फ तुम  और कोई भी नहीं कभी भी नहीं  तुम्हारे सिवा हाँ तुम... सीमा असीम 
 पल भर को खयाल जिसका जाता नहीं दिलो दिमाग से  रहना पड़ता है उसी शख्स के बिना दुनिया जहान में   जो मेरा है वह सिर्फ मेरा ही है हमेशा-हमेशा के लिए  दूर हो चाहें कितना भी, रहता है मन में सदा के लिए  जिसकी याद में आंखें छलक छलक आती हैं बार-बार  तू भी तो यूं ही याद करता है मुझे बेचैन होकर  बार बार

ख़्वाहिश

 ख्वाहिश है मेरी  समुंदर का किनारा हो  और बरफ की घाटियां भी हो  कभी समंदर के किनारे चलते-चलते बहुत दूर निकल जाए पर समुन्दर का छोर न ढूंढ पाये   कभी घाटियों की छोटी मोटी टेढ़ी-मेढ़ी आड़ी तिरछी पगडंडियों पर चलते हुए हिमालय की चोटी पर पहुंच जाएं कभी कोई गीत गुनगुनाए सु मधुर धुन में  कभी सिर्फ बातों में ही खोए रहें   और चलते चले जाए चलते चले जाए इस धरती से उस अंबर तक  हम तुम तुम हम  अनंत तक   साथ साथ  हमेशा साथ साथ  सीमा असीम

रूह

  इस दौड़ भाग भरी और बेचैनी से भर देने वाली जिंदगी में  मैं चलना चाहती थी तुम्हारे साथ साथ इस छोर से उस छोर तक धरती से आकाश तक अंबर से गगन तक और क्षितिज तक पहुंचना चाहती थी  मैं थोड़ी देर टिके रहना चाहती थी  एक दूसरे का सहारा बनकर  कभी मैं लड़खड़ाती , तो तुम सहारा देते  जब तुम लड़खड़ाते तो मैं सहारा देती  पर नहीं शायद तुम्हें  सिर्फ एक सहारा मंजूर नहीं था क्योंकि   सहारे बदल बदल कर चलना तुम्हें शोभा देता होगा  कुछ दूर कुछ कदम किसी का हाथ पकड़कर  कुछ कदम किसी और का हाथ पकड़कर  चलते  जाना तुम्हें अच्छा  होता होगा शायद  तभी तो तुम ने मेरा साथ छोड़ा और किसी दूसरे का हाथ पकड़ लिया  किसी दूसरे का हाथ छोड़ने के बाद क्या तुम फिर मेरा हाथ पकड़ पाओगे  क्या तुम फिर वही प्यारे इंसान बन पाओगे  जो तुम मेरे साथ चलते चलते बने थे  एक बहुत प्यारे  इंसान  जिसका रिश्ता था रूह से रूह तक  मेरा अभी भी है  पर तुमने रूह से ज्यादा जरूरी समझा शरीर को   तुमने शरीर से रिश्ता बनाया  द...

साथ हमारे

 यह सूरज चांद सितारे  सब कोई तो है साथ हमारे  जब मैं गाती हूं तो यह सब भी  गाते हैं जब मैं रोती हूं तो इस सब भी रोते हैं और जब मैं हंसती हूँ तो इससे भी हंस पड़ते हैं  क्योंकि यही सब तो साक्षी है हमारे एहसासों के  हमारे साथ के  कितनी सारी बातों के गवाह है ना यह सब  दरअसल देखा जाए तो यही सब तो गवाह है  हमारी तुम्हारी हर बात के  जहां कोई नहीं होता वहा यह साथ थे  कल भी थे  आज भी है  और हमेशा रहेंगे  यह सूरज चांद सितारे हमारे साक्षी हर बात के... सीमा असीम 26,1,22

बंधन

 तुम्हें हर पल याद करना  इतना मुश्किल नहीं है  जितना मुश्किल है  तुम्हें पल भर को भूल जाना  कि तुम खुद चले आते हो  कभी मेरे ख्यालों में  कभी मेरे ख्वाबों में  कभी मेरी बातों में  कहाँ भूलते होगे तुम भी मुझे पल भर को  जब हर पल मैं तुम्हें याद करती हूँ  तुमसे बात करती हूँ मन ही मन में  कि बध गए हो तुम मेरे मन के बंधन में  और मन के बंधन से कैसे मुक्ति मिलेगी न जीते जी न ही मरने के बाद  हां बांध लिया है मैंने तुम्हें  बन के बंधन में  जन्म जन्मांतर के लिए!! सीमा असीम 25,1,22

मनन

 मैं सोचती नहीं हूँ तुम्हें  बस मनन करती हूँ तुम्हें  दिन रात सुबह शाम  हर पल हर वक्त  सिर्फ तुम ही तुम  सोचना नहीं चाहती अब तुम्हें मैं  कि तुम्हें सोचते ही  मेरी धड़कने थम जाती हैं  बेहोशी तारी हो जाती है  मैं खुद में ही नहीं रह पाती  आ जाती हूँ तुम तक  समा जाती हूँ तुम में  फिर मैं मैं नहीं बल्कि तुम हो जाती हूँ  सिर्फ तुम  बस इसलिए करती रहती हूँ मनन  तुम्हारे नाम को ले ले कर जपती रहती हूँ  माला की तरह मन ही मन में  तुम्हें हाँ सिर्फ तुम्हें ... सीमा असीम  23, 1,22 
अभी वह मिलन के बारे में सोच रही थी कि मिलन का फोन आ गया कहां हो अभिषेक क्या तुम पहुंच गई वहां पर हां हां मैं आ गई हूं और आप किस समय आएगी मैं समय पर पहुंच जाऊंगा और हां सुनो क्या तुमने ऑर्गेनाइजर को मेरा नंबर दिया था हां क्यों कोई गलती हो गई क्या नहीं नहीं गलती नहीं उल्लू को कहीं फोन आ गया था मेरे पास किस समय पर आना है और सम्मान शायद वह मेरे हाथों ही दिलवाना चाहते हैं अरे वाह यह तो बहुत अच्छी बात है एक पंथ दो काज  हां तुम कह सकती हो एक पंथ दो काज, मिलना भी होगा और सम्मान भी मेरे हाथों से विशी की ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था ईश्वर भी कितना मन मौजी है जब मन किया तो ढेरों खुशियाँ दे देगा और जब किया तो इतने गम...  खैर कोई बात नहीं जो होता है अच्छे के लिए ही होता है वो कहते हैं ना देर आए दुरुस्त आए  एक अलग सा सॉफ्टवेयर है उसके लिए उसके दिल में लेकिन नहीं पता ही क्या है क्या यह प्रेम है या केवल एक  भावना जो भी है ठीक है उससे बात करना अच्छा लगता है और मिलने का मन भी करता है  आज उसके दोनों काम पूरे हो जायेंगे! वो उसके साथ खूब बातें करेगी खूब सारा समय भी उसके साथ में बित...

एक माला बनती है

 तुम्हें सोचना और तुम्हें लिखना दोनों अलग चीज है  क्योंकि सोचती तो हर वक्त हूँ  तुम्हें  मैं पल भर को भी नहीं भूलती हूं तुम्हें   पर लिखती हूं कभी कभी तुम्हें  तुम्हें लिखना मतलब दर्द में डूब जाना  असह पीड़ा को सहन करना  डूबना और डूबते चले जाना  क्योंकि तुम्हें लिखना आसान नहीं है मुझे  तुम्हें सोचना आसान है  बहुत सरल है  जैसे तुम्हें सोचते हुए कभी मुस्कुरा देना और कभी रो के आंसू बहा लेना  कभी तुमसे मन ही मन बातें  करना  कभी तुमसे प्यार की मनुहारें  करना  कितना सरल  है ना सोचना तुम्हें  पर तुम्हें लिखना कितना मुश्किल  एक-एक आंसू से एक-एक अक्षर को लिखा जाता है  जब भी मैं तुम्हें लिखने की कोशिश करती हूं  तो बस आंसुओं की धारा से मैं अपने खून से सीचते हुए  एक-एक शब्द को पिरोती हूं और फिर  आंसू और  खून से मिलकर गुधते हैं एक एक शब्द तब बनती है एक माला  तुम्हें लिखने की  डूब कर सोचते हुए... सीमा असीम 21,1,22
 प्रकृति किसी को यूं ही सजा नहीं देती, बहुत दुखी होकर बहुत तकलीफ में आ कर, बहुत कष्ट सहकर चुपचाप सबकुछ अकेले ही सब्र के साथ रहकर जब थक जाती है तब फिर वह तांडव करती है इतना भयंकर तांडव कि जिस जिस ने उसको सताया उसकी रूह तक कांप उठे, रोम रोम उसका सिहर जाए, अब तक जो सहती आई थी प्रकृति बिना कुछ कहे बिना कुछ बोले, अब कुछ उसे अपना बदला लेना ही होता है आखिर वो कब तक रहेगी सांझ की सुबह हो ही जाए, हर उस शख्स को उसकी करने की सजा मिल ही जाए, उसके दिल में जो चल रही थी दावानल उसको थोड़ी सी शीतलता मिले ही जाए,कुछ उसके सब्र को करार आए  प्रकृति जैसे अपना न्याय करती है वैसे वह दूसरे का भी न्याय करती है, किसी के प्रति भी किए गए अन्याय को सहन नहीं कर पाती अगर वह  अन्याय सहन करती रहती तो मैं कभी बदला नहीं लेती,, उसके साथ हुआ जो भी अन्याय है उसी ने तो मिलना ही मिलना है प्रकृति को अपना न्याय लेना आता है और वह अपना न्याय लेकर रहती है,,,

दिल खिल जाये

 आँख के आँसू थमते नहीं है क्यों तुम इस तरह बहने लगते हो तुम हो मेरे दिल में बसे हुए बंद किये हुए आजद होने को इस तरह छलकते हो कभी तो होठों पर आकर बैठो खुल कर हँसो तुम संग मेरे मुझे भी हँसा दो सनम दिल खोलकर तुम मानो महक उठी हो सारी बगिया खिल गये हो फूल ही फूल गीत गाने लगी हो कोयल आम की डाल पर बैठकर पीपीहे की प्यास भी बुझती है बड़े प्यार से बुलाया गले लगाया अब तुम करो न मेरी  परवाह रखो मेरा ख्याल ओ सनम दिल खिला दे मेरा असीम