निर्मल

  कितना निर्मल जल होता है दरिया का उसमे कहीं कोई मिलावट नहीं कोई कुछ नहीं साफ एकदम... न जाने कहां से पथरीले पत्थर जैसे घृणा द्वेष नफरत आ जाते हैँ और फिर हमें जख्मी करते रहते हैं... हां यही तो होता है अक्सर जब हम प्रेम में होते हैं तो एकदम निर्मल दरिया की तरह एक दूसरे के साथ प्रेम की बाहों में मगन होकर बहते रहते हैँ...  फिर धीरे-धीरे करके नफरत घृणा और द्वेष के पत्थर आने लगते हैं प्रेम के दरिया में और फिर हमारे मन को आत्मा तक को जख्मी कर देते हैं.... इन पत्थरों से जो जख्म हो जाते हैं वह नासूर की तरह रिसते रहते हैं, इतना दर्द होता है, इतना दर्द होता है कि आंसू रोके ही नहीं रुकते किसी भी तरह से, किसी भी हाल में हम   अपने आंसुओं को रोक ही नहीं पाते हैँ यह बहते रहते हैं दर्द से बोझिल होकर,,,   निर्मल पवित्र बेबस से बेचारे आँसू.... 

असीम 

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