निष्ठुर

 कैसे हो जाते हो तुम इतने निष्ठुर 
 कैसे इतने कठोर हो जाते हो 
क्यों आ जाता है तुममें अहम 
 क्यों तुम  इतने बेदर्द हो जाते हो 
हां अक्सर यही सवाल तो मेरे दिल में होता है मैं सोचती रह जाती हूं कि तुम इतने मुलायम कोमल निर्मल नदी के सामान बहते हुए थे जो हर समय मेरे आस-पास रहते थे.... 
मंडराते रहते थे किसी बादल की तरह और बरस जाते थे अभी आसमा की झुक जाते थे.. फूलों सी मुस्कान बिखेर देते थे मेरे आस पास...
खिला खिला  रहता था मेरा मन मेहकता हुआ जादुई एहसास से भरा रहता था 
कभी कोई मन में  नफरत घृणा द्वेष ऐसी कोई बात नहीं..
 जानती ही नहीं थी यह भी कोई शब्द होता है फिर कैसे क्या हो गया इतना नरम कोमल मुलायम दरिया जैसा  तुम्हारा दिल एकदम कठोर पर्वत की तरह हो गया 
 क्या तुम्हें लगता भी नहीं कभी क्या तुम कभी सोचते  भी नहीं
 मैं बहुत दुखी हूं 
 ऐसा क्यों आखिर क्यों?

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