हे ईश्वर देखो ना
कितनी बारिश हो रही है आसमान से और
उतनी ही बरसात हो रही है मेरी आँखों से
मैं अकुला जाती हूं
घबरा जाती हुँ
सोते से जगकर बैठ जाती हुँ
ढूंढने लगती हूं तुम्हें
यहां वहाँ
जहां-तहां
कितनी पागल हो ना मैं
मूर्ख हूं पूरी की पूरी
जब रहते हो मेरे मन में तुम और
तुम्हारे मन में मैं
तो क्यों ढूंढने लगती हूं तुम्हें
कहीं भी किधर भी...
सीमा असीम
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