कुछ इंसान अपने चेहरे पर ना जाने कितने चेहरे लगाए रहते हैं समझ में नहीं आता कि उसका असली चेहरा कौन सा है हां मुझे लगता है तुम भी तो ऐसे ही हो क्या मैं सच हुँ  या गलत ? क्या मैं सही हूं यह मैं झूठ ? अगर मैं सही हूं तो  मैं तुम्हारे चेहरे को इतना देर से कैसे पहचान सकी ? वैसे मुझे तो पहले ही समझ आ गया था लेकिन  वह कहते हैं ना कि झूठे को अंत तक  पहुंच जाना चाहिए ! हां मैं अंत तक पहुंचाना चाहती थी मैं देखना चाहती थी अंजाम!

 हां इसमें बहुत सारे दुख थे,  कष्ट थे, तब भी  मुझे खुशी है कि मैं तुम्हें पहचान तो सकी, तुम्हें पहचानना खुद को पहचानना नहीं था ! वह तो सिर्फ तुम्हें पहचाना था ! खुद को पहचानने के लिए मैं खुद में उतरी और आज मैंने खुद को पहचान भी लिया कि मैं सच हूं और हमेशा सच ही रहूंगी और मेरा मन हमेशा सच्चा पवित्र ! इसे कोई भी नहीं झुठला सकता इसे कोई भी नहीं खत्म कर सकता ! मैं सच्ची हूं और सच्ची ही रहूंगी.... 

 निर्मल पवित्र आत्मा से मनन चिंतन और लगन लगाए रहूंगी...

 हो जैसे भी हो तो आखिर मेरे ही, हां सिर्फ मेरे... 

असीम 

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