कविता

अब तुम ही बताओ मुझे कि कैसे दूर जाएँ हम तुमसे 

जहाँ भी जाती हूँ तुम वहीँ पर आ जाते हो 

जिस किसी को देखूं तुम ही दिख जाते हो 

और तो कोई नजर आता नहीं है 

सिवाय तुम्हारे सिर्फ तुम ही तुम 

तुम फूलों में पत्तों में पौधों में 

हर जगह पर बस तुम्हारा ही अक्स 

जागती आँखों में भी और सोने के बाद ख़्वाबों में भी 

क्यों नहीं जाते तुम पल भर को भी मुझसे दूर 

क्या तुम्हें मैं इस कदर याद आती हूँ कि 

हर वक्त मन मस्तिष्क में चिपके रहते हो 

या यूँ कहें कि बादलों की तरह मुझ पर छाये रहते हो 

आकाश की तरह झुके रहते हो 

बारिश हो जाए गर कभी 

तो हर बूंद में तुम ही तो होते हो और

खिंच लेते हो यूँ चुम्बक की तरह 

मुझे बारिश में भीगने के लिए और 

कर देते हो मुझे तरबतर अपने ही अक्स से 

तब सुनो मैं मैं नहीं रहती मैं तुम बन जाती हूँ 

सिर्फ तुम ही तुम 

मैं कहीं भी नहीं .........

सीमा असीम सक्सेना 

१६,६,२२ 

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