कविता
निर्मल झील में खड़े होकर
पल भर को आंखें बंद करके
इसकी गहराई की तरह
खुद में गहरे उतरते हुए
सोचा मैंने
जरूरी है सोचना भी कि
कितने विस्मयों से भरी हुई है यह पृथ्वी
कितनी खूबसूरती समाई हुई है इसमें..
सूरज चांद को तकते हुए
या फूलों को निहारते हुए
अक्सर यही तो सोचती हूँ मैं
कि खूबसूरती सारी हमारे मन में होती है
निर्मलता पवित्रता सारी हमारे मन से होती है
सारे अचंभे सारे विस्मय हमारे मन में होते हैं
अगर हम सच में महसूस कर सके तो
या फिर एहसासों में भर सके तो.....
सीमा असीम

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