आँसू हैं या लहू

 जब आँख से आँसू बहने शुरू होते हैं 

तब बहते ही रहते हैं 

रुकते ही नहीं हैं 

मानों आँखों से कोई समुंदर फूट पड़ा हो 

जो थमने का नाम ही नहीं ले रहा 

ऐसा लगता है 

जिस्म का सारा लहू आँखों से बह बह कर बाहर आ रहा है 

और बेजान सा जिस्म एक तरफ को पड़ा रहता है 

मैं सोचती हूँ कि तुम ऐसे हो अगर तो ऐसे क्यों हो 

क्या तुम हम जैसे इंसान नहीं हो 

क्या तुम्हारे अंदर कोई भावना नहीं है 

कोई दर्द नहीं है 

कोई तकलीफ का अहसास नहीं है 

तुम कैसे कर लेते हो सब कुछ इतनी आसानी से 

कोई मर रहा है अगर 

तो तुम उसे यूं ही मरने के लिए छोड़ देते हो 

इतने कठोर शब्दों का इस्तेमाल कैसे कर लेते हो 

प्रेम के नाम पर नफरत फैलाने वाले काम कैसे कर लेते हो 

क्या तुम्हारा कोई माँ बहन नहीं है 

क्या तुम औरत को सिर्फ इस्तेमाल किए जाने वाली वस्तु मात्र समझते हो 

सुनो हे निर्दयी मानव 

तू कैसे तड़पा लेता है 

तू कैसे रुला लेता है 

क्या तू दानव है या राक्षस 

तुझे जरा भी दया धर्म नहीं है 

नोच खसोट के तन मन से बर्बाद कर देने वाला 

तुझे क्या कहूँ मैं 

तू खुद समझ ले 

आज नहीं तो कल 

एक दिन तू जरूर समझेगा 

यह निश्चित है 

तू भी यूं ही कष्ट सहेगा 

यह सच कभी नहीं बदल सकता 

वक्त बदलेगा एक दिन जरूर बदलेगा 

याद रखना यह आँसू मेरे 

कभी जाया नहीं जाएँगे । 

सीमा असीम 


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