तुम और मैं
जब मैं तेरे साथ रहती
तब मैं अकेली सी रहती थी
अब मैं दूर हूं तुझसे
तू भी क्यों हरदम इतने करीब रहती हूं
कि तुम रहते हो हमेशा मेरे साथ
मेरी परछाई बनकर मेरे आस-पास
कभी पल भर भी तो तुम दूर नहीं जाते हो मुझसे
एक पल को भी तो अकेला नहीं छोड़ते हो तुम मुझे
चलते रहते हो संग संग
बैठे रहते हो संग संग
बातें करते रहते हो संग संग
सो जाते हो तुम संग संग
ख्वाबों में भी तो कहां दूर जाते हो तुम
कभी जगा देते हो अचानक से
तो भी तो पल भर को दूर नहीं जाते
मेरे एहसास हरदम तुम्हारे साथ रहते हैं
यूं कहो कि तुम एहसास बनकर
सदा मेरे साथ रहते हो
कभी कहीं एक क्षण को भी तो अलग नहीं होते हो
क्यों आखिर क्यों क्यों रहते हो तुम मेरे साथ
फिर खुद में कौन रहता होगा तुम्हारे
तुम अब तुम नहीं रहे हो
तुम मैं बन गए हो क्या
तुम्हें पता नहीं
जैसे मैं तुम बन गई हूं और तुम मैं बन गए हो
असीम
Comments
Post a Comment