ख़्वाहिश

 ख्वाहिश है मेरी

 समुंदर का किनारा हो

 और बरफ की घाटियां भी हो

 कभी समंदर के किनारे चलते-चलते बहुत दूर निकल जाए पर समुन्दर का छोर न ढूंढ पाये 

 कभी घाटियों की छोटी मोटी टेढ़ी-मेढ़ी आड़ी तिरछी पगडंडियों पर चलते हुए

हिमालय की चोटी पर पहुंच जाएं

कभी कोई गीत गुनगुनाए सु मधुर धुन में

 कभी सिर्फ बातों में ही खोए रहें 

 और चलते चले जाए

चलते चले जाए इस धरती से उस अंबर तक

 हम तुम

तुम हम 

अनंत तक 

 साथ साथ

 हमेशा साथ साथ 

सीमा असीम

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