प्रकृति किसी को यूं ही सजा नहीं देती, बहुत दुखी होकर बहुत तकलीफ में आ कर, बहुत कष्ट सहकर चुपचाप सबकुछ अकेले ही सब्र के साथ रहकर जब थक जाती है तब फिर वह तांडव करती है इतना भयंकर तांडव कि जिस जिस ने उसको सताया उसकी रूह तक कांप उठे, रोम रोम उसका सिहर जाए, अब तक जो सहती आई थी प्रकृति बिना कुछ कहे बिना कुछ बोले, अब कुछ उसे अपना बदला लेना ही होता है आखिर वो कब तक रहेगी सांझ की सुबह हो ही जाए, हर उस शख्स को उसकी करने की सजा मिल ही जाए, उसके दिल में जो चल रही थी दावानल उसको थोड़ी सी शीतलता मिले ही जाए,कुछ उसके सब्र को करार आए
प्रकृति जैसे अपना न्याय करती है वैसे वह दूसरे का भी न्याय करती है, किसी के प्रति भी किए गए अन्याय को सहन नहीं कर पाती अगर वह अन्याय सहन करती रहती तो मैं कभी बदला नहीं लेती,, उसके साथ हुआ जो भी अन्याय है उसी ने तो मिलना ही मिलना है प्रकृति को अपना न्याय लेना आता है और वह अपना न्याय लेकर रहती है,,,
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