एक माला बनती है

 तुम्हें सोचना और तुम्हें लिखना दोनों अलग चीज है

 क्योंकि सोचती तो हर वक्त हूँ  तुम्हें 

मैं पल भर को भी नहीं भूलती हूं तुम्हें 

 पर लिखती हूं कभी कभी तुम्हें

 तुम्हें लिखना मतलब दर्द में डूब जाना

 असह पीड़ा को सहन करना

 डूबना और डूबते चले जाना

 क्योंकि तुम्हें लिखना आसान नहीं है मुझे

 तुम्हें सोचना आसान है

 बहुत सरल है

 जैसे तुम्हें सोचते हुए कभी मुस्कुरा देना और कभी रो के आंसू बहा लेना

 कभी तुमसे मन ही मन बातें  करना 

कभी तुमसे प्यार की मनुहारें  करना

 कितना सरल  है ना सोचना तुम्हें

 पर तुम्हें लिखना कितना मुश्किल 

एक-एक आंसू से एक-एक अक्षर को लिखा जाता है 

जब भी मैं तुम्हें लिखने की कोशिश करती हूं 

तो बस आंसुओं की धारा से मैं अपने खून से सीचते हुए 

एक-एक शब्द को पिरोती हूं और फिर 

आंसू और  खून से मिलकर गुधते हैं एक एक शब्द तब बनती है एक माला

 तुम्हें लिखने की

 डूब कर सोचते हुए...

सीमा असीम

21,1,22

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