मनन
मैं सोचती नहीं हूँ तुम्हें
बस मनन करती हूँ तुम्हें
दिन रात सुबह शाम
हर पल हर वक्त
सिर्फ तुम ही तुम
सोचना नहीं चाहती अब तुम्हें मैं
कि तुम्हें सोचते ही
मेरी धड़कने थम जाती हैं
बेहोशी तारी हो जाती है
मैं खुद में ही नहीं रह पाती
आ जाती हूँ तुम तक
समा जाती हूँ तुम में
फिर मैं मैं नहीं बल्कि तुम हो जाती हूँ
सिर्फ तुम
बस इसलिए करती रहती हूँ मनन
तुम्हारे नाम को ले ले कर जपती रहती हूँ
माला की तरह मन ही मन में
तुम्हें हाँ सिर्फ तुम्हें ...
सीमा असीम
23, 1,22
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