अपनी तारीफ़ खुद ही करते हो
गलत को भी सच साबित करते हो
कितने स्वार्थी हो तुम अब समझी हूं
एक चेहरे पर कई चेहरे लगाया करते हो
उफ्फ ऐसे हो तुम क्यों नहीं जाना पहले
शर्म न लिहाज जरा भी तुम्हें क्या
झूठ को सच क्यों बनाते फिरते हो
काश कि आए थोड़ी तो लिहाज तुम्हें
अपनी गलतियों का अहसास हो तुम्हें।।
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