याद

  यूं ही तो नहीं आती है मुझे उसकी याद 

वह भी तो हमें यूं ही याद किया करता होगा

 कहां भूल पाता होगा पल भर को भी मुझे 

हर आती जाती सांस से मेरा नाम लिया करता होगा

 भेजता होगा पैगाम ए मोहब्बत 

कभी हवाओं से कह कर 

कभी घटाओ से कह कर 

कभी फिजाओं से कहकर 

अकेले में घंटों बैठकर गुजार दिया करता होगा

दूर तक बिखरी हुई वादियों में बैठकर

 जोर से मेरे नाम की आवाज लगाया करता होगा 

कभी नदी के किनारे बैठ कर देखता होगा जो अपनी परछाईं 

 तो मेरी अक्स पा लेता होगा 

अंजलि से पकड़ने की कोशिश करता होगा अगर 

तो पर उसके हाथ में कुछ भी नहीं आता होगा

 अश्कों से भिगो लेता होगा अपना चेहरा 

अपनी आत्मा को भी धोकर पवित्र कर लेता होगा

 बस यूं ही दिन रात वो भी मुझे याद किया करता होगा

 हर आती जाती सांस से मेरा नाम लिया करता होगा..

सीमा असीम . 


असीम 

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