तू क्या जाने भला, तू कैसे समझेगा भला तू तो स्वार्थ में भरा हुआ एक स्वार्थी इंसान है जिसे दिखाई देती है सिर्फ अपनी खुशी दूसरे को दर्द देने के बाद तू और खुश होता है.... अब तू मौत को तरसे इतना जये कि धरती त्राहि त्राहि कर उठे
मुस्कुराना
कितना अच्छा लगता है सुबह सुबह सूरज का निकलना पंछियों का चहकना फूलों का खिलना और रोशनी का बिखर जाना रात के अंधेरे को मिटाते हुए जब रोशनी होती है तो मन खुशी से प्रफुल्लित होता है बहुत अच्छा लगता है मुझे दुनिया को रोशनी में देखना मुझे नहीं पसंद अंधेरा नहीं पसंद मुझे मुरझाना नहीं पसंद मुझे रोशनी का कम हो जाना लेकिन सुनो इस सब से भी ज्यादा अच्छा लगता है मुझे तुम्हारा मुस्कुराना तुम्हारा मुझ से बतियाना....... सीमा असीम 3, 10, 20
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