हाँ हैं प्रेम में

शरमा आती है धरा

सकुचा जाती है धरा

भूल जाती है डगर चलते चलते

बैठ जाती धरा

बाँध कर अपनी बाहों को

टिका देती है अपनी ठोड़ी कलाईयों पर

और घूरती है जमीन को

एक ही कोण में

तकती है दौड़ती हुई गिलहरी को

उसकी पीठ पर बनी तीन धारियों को

उसे माँ की कही व बात याद आती है

बेटा यह भगवान राम ने प्रेम से इसकी

पीठ पर अपना हाथ फिराया था

तो वे निशान क्या अब तक बने है

वो सोती है

तभी किसी कौवे की कांव कांव से ध्यान भग्न होता है

उबर जाती है वो इस सोच से

और डूब जाती है धरा

अपनी सोच में अपने आसमां की स्मिर्तियों में

जब वे साथ थे

तब आसमां सिर्फ धरा का था

कितना प्यारा साथ था

कितना प्यारा अहसास था

स्वर्ग से भी ज्यादा सुंदर

कराह उठी धरा 

एक आह निकल गयी

उसके मुंह से

टपक गया उसकी दाई आँख से एक आंसू

फिर बह उठे दोनों आँखों से

गालों को भिगोते हुए

बेपरवाह से आसमां

क्या तुझे पता है

तुझे अहसास है

बुदबुदाती है मन ही मन धरा

खड़ी हो जाती है धरा

खोलकर अपनी दोनों बाहें

फैला देती आसमां की ओर

आँखे बंद करके पुकारती है धरा

और चूम आती है अंतर्मन

हाँ चूम आती है धरा

आसमां का अंतर्मन

सबकी नजरें बचाकर

सकपका जाती है धरा

आसमा झुक जो आया है उसके मुख पर  !

सीमा असीम 

Comments

Popular posts from this blog

मुस्कुराना

याद