छटपटाहट बेचैनी से घिरी
किसी गहराई में डूबी हुई मैं
लाख कोशिश उबरने की करती हूँ
पर और गहरे उतर जाती हूँ
असहनीय पीड़ा से
चीत्कार करता है मेरा मन
न चाहते हुए भी
आसुओं से भरी आँखें
बहने लगती हैं
कोई सहारा नहीं
कोई किनारा नहीं
तब मैं तुझे आवाज देती हूँ
बार बार पुकारती हूँ
पर सुनो
इतना समझ लो
कि न तुम मुझे उबारो
न संग मेरे डुबो
बस एक अहसान कर दो
अपना अहसास साथ रहने देना
ताकि न डूब पाऊँ न उब पाऊँ

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