न आत्मा न अन्तर्मन 
आँख की नमी पल भर को नहीं सूखती
नींद आए भी कैसे आँख नहीं झपकती
जीवन का हर लम्हा किया तुम्हारे हवाले
फिर क्यों तुम भटक गए
अपनी जान तक सौप दी फिर भी
तुम दर्द देते रहे मैं चुपचाप घूंट घूंट पीती रही
नस नस मे जहर बन के उतार दिया दर्द
क्या गुनाह था मेरा
क्यों दी मुझे सज़ा
मार दिया मुझे बिना मौत
किसलिए
कि मैं कभी पलट कर जवाब नहीं देती हूँ न
सरेआम तुम्हें बदनाम नहीं करती हूँ न
तुम चीखते हो
मैं सुनती हूँ
मुझे झूठ कहते हो न
मुझ पर विशवास नहीं करते हो न
मुझे मेरी औकात दिखाते हो न
कुछ नहीं कहती
उस तकलीफ को बहा देती हूँ आँखों से
कर लिया अब अपना जिस्म तक बेजान
लेकिन चलो तुम तो खुश हो न
तुम यही चाहते थे न
सुनो प्रिय, क्या तुम्हारे लिए इतना काफी नहीं था
कि मैं सिर्फ तुम्हें प्यार करती हूँ
क्या तुम्हारे दिल में मेरी किसी तकलीफ का
एक बार भी ख्याल नहीं आता
नाम मात्र का रंज नहीं होता
एक दिन मैं नहीं रहूँगी दुनियाँ में
प्रिय तब तुम मुझे मत याद करना
खुश रहना
बस यूं ही अपनी नई दुनियाँ मे
दुनियाँ में बहुत खुशियाँ है
मैं नहीं होउंगी तो क्या
वैसे भी
आज के दौर मे न तो किसी की आत्मा होती है और न ही अन्तर्मन !!
सीमा असीम 

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