उदास थी धरा
बेहद उदास
असमर्थ सी
उन बेपरवाह
उबड़ खाबड़
सकरे
चौड़े
घुमावदार
रास्तों से
भागते दौड़ते
आगे ही आगे
उन्नति के लिए
सिर्फ अपने ही
बिषय में सोचते
उपेक्षित करते जाते
उसमें भरते जाते
जहरीली निशा
निरर्थक और व्यर्थ समझ
उसकी चमक
सोधी गंध
खो रही है
खो गयी है
वो मुस्कुराने की आस में
निहारती है
कुछ और कुम्हला जाती है
पहले से ज्यादा उदास हो जाती है
आसमां में निकल आया है
पूनम का चाँद
चांदनी ने ढक लिया
उसके दाग को
वो मुस्कुरा रहा है
कितना प्यारा लगता है चाँद
यूँ मुस्कुराते हुए
मुस्कुरा लेने दो उसे
अब वो भी उदास नहीं है
नहीं होना चाहती है वो
अब उदास
चमक उठा है कण कण
मुस्कुरा जो दी है धरा
चाँद को खुश देखकर
वो पूनम का चाँद
औ धरा निहारने लगती है
फिर से आसमां !!!
असीम

Comments
Post a Comment