प्रेम की भाषा 
सावन ने रंग दिखा कर
गरज बरस कर
भादों मे पाँव रख लिया
पर रंग चढ़े मन पे
नहीं चढ़ पाया कोई दूजा रंग कभी
ना बारिशों ने धुंधला पाया वो रंग


एक पक्के रंग पर कहाँ चढ़ता है
कोई अन्य रंग
गर चढ़ जाये तो बदरंग होकर
खो देगा अपनी चमकती चमक
अपनी महकती खुशबू


सुनो प्रिय
रंग लिया है खुद को तुम्हारे ही पक्के एक रंग मे
तुम्हारी ही खुशबू से तरबतर होती हुई
तुम्हारे अहसास को जीती हुई
हर सांस के साथ नाम लेती हुई
अब जीवन जीने का यही तो एकमात्र आसरा है



क्योंकि तुम्हारे  होने से ही मेरा अस्तित्व है तभी तो
कल्पनाओं मेँ तुम्हारे गले मेँ बांहे डाल कर
चुपके से तुम्हारे कान मेँ पूछना चाहती हूँ
क्या तुम भी महसूस करते हो मेरे इन अहसासों को
लेकिन तुम मेरे सवालों पर मौन रहते हो
और मैं खिलखिला कर हँस देती हूँ
कि तुम भला क्या समझोगे प्रेम की भाषा !!
@सीमा असीम 

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