बन जाती हूँ मिट्टी 
तुम्हारे संघर्षो के दिनों में

हताश निराश और परेशान हो

घबरा जाती हूँ

तब बना लेती हूँ खुद को मिटटी

हर बार

बार बार

ढह जाती हूँ पोली होकर

बन जाती हूँ

गीला टीला

उसमे से भी निकलती रहती है

एक दुआ हरवक्त

सिर्फ तुम्हारे नाम की

उबर जाओ

निकल आओ

कीचड़ रूपी

संघर्षी दलदल से

और देखो कमाल कि जीत जाता है

इस मिटटी का भी विश्वास

हमेशा ही

बना लेते हो फिर से

वैसा ही देकर आकार

ज्यों का त्यों

ढाल कर अपने सांचें में

पहले से ज्यादा

शानदार निखार देते हुए

यूँ ही तो नहीं करती ये

मिटटी भी इतना विश्वास

तुम पर  !!

 सीमा असीम 

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