कविता 

धरा 


कितना प्रेम करती है धरा

इन पौधों से पेड़ों से पक्षियों से

प्रकृति से पूरी कायनात से

पता नहीं क्यों लुटा देना चाहती है

अपना वात्सल्य भरा स्नेह

वनस्पतियों पर

हर अणु हर कण

उसे बहुत प्यारा लगता है

नदी का पानी

सागर का पानी भी उसे कहाँ खारा लगता है

हर शय उसे बहुत प्यारी लगती है

पूरी दुनियां अपनी सी लगती है

बेहद प्यारी सच में

क्यंकि धरा प्रेम में है

अपने प्रिय आसमां के प्रेम में

प्यारे बेपरवाह उस आसमाँ के प्रेम में !!

सीमा असीम 

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