हम परिस्थितियों के कभी गुलाम नहीं होते बल्कि हम स्वयं परिस्थितियो को ऐसा बना लेते हैं कि परेशानियाँ हमारा पीछा न छोड़े
आज हम अनेकों मानसिक व्याधियों से पीड़ित हैं ! मानसिक विकृतियों का शिकार हो रहे हैं ! इसके लिए कौन दोषी है हम या समाज ?
     इंसान भले ही परिस्थितियों को दोष दे, समाज को गलत कहे लेकिन कहीं न कहीं वो खुद ही जिम्मेदार है लेकिन वो अपनी गलती कभी मानना ही नहीं चाहता और फिर असमान्य जीवन जीने को विवश हो जाता है ! उसके साथ परिवार को भी परेशान होना पड़ता है !
जरा सी बात को वो खींचता ही चला जाता है और मकडे के जाले की तरह उसमें उलझ जाता है ! लाख कोशिश करो फिर उस जाले से निकलना नामुमकिन होने लगता है फिर उसके पास मरने के अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं होता है !
जैसे आज हम व्यसनों का शिकार होकर उनसे किसी तरह निजात ही पाना नहीं चाहते, भले ही हमें जीवन भर पछताना ही क्यों न पड़े !
झूठे भ्रम में पड़कर अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं क्योंकि आज लोगों का जीवन दर्शन ही बदल गया है वो सिर्फ स्व को देखता है, मैं को पूजता है हम तो न जाने कहाँ खो गया है ! सिर्फ अहं जीवित रह गया ! यानि जो कुछ हूँ सिर्फ मैं हूँ और इसी कारण निराशा का शिकार हो जाता है तथा एक दिन वो ख़ुद से ही हार जाता है !
और जो स्वयम से ही हार मान ले तो फिर उसे कौन जिता सकता है !
मानसिकता या सोच हमारी जिंदगी का एक ऐसा पहलू है जिससे हम जिस तरह चाहें वैसा ही बना सकते हैं किन्तु सबसे पहले अपने अंदर जीवन को जीने का जज़्बा पैदा करना होगा और खुद को परिस्थितियों का गुलाम नहीं बल्कि उनका निर्माता बनाना होगा ! हमे अपने रवैये बदलने आने ही चाहिए !! 

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