गतांक से आगे .....
 रिया तू मुस्करा 

अपनी खुशी के लिए दूसरे को दुख दे देना, अपने चेहरे की खुशी के लिए दूसरे की आँखों में  आँसू भर देना आखिर तुम कैसे कर लेते हो मैं तो सिर्फ जीना चाहती थी लेकिन तुमने तो मुझे मौत दे दी वो ऐसी जो जीवित रहकर भी जीवित नहीं है ..... यह मेरे मन की बेचैनी मुझे पल भर भी जीने नहीं देती ! मैं अपने पंखों के सहारे उढ़ना चाहती थी लेकिन तुमने तो मेरे पंख ही कुतर दिये ! क्या यही तुम्हारा सच है ? मेरे मन में उठते अनेकों झंझावत मुझे सकूँ से सांस भी नहीं लेने देते ! किस तरह अपने मन को समझाऊँ कुछ समझ ही नहीं आता ?
मैंने तुम्हें उस बिस्तृत आकाश से परिचित करवाया था लेकिन तुम उस आकाश के अकेले ही राजा बनने की सोचने लगे ! पता है मैं अपने मन को कितना समझती हूँ लेकिन तुम्हारी भाषा, तुम्हारे विचार मेरे मन को छिन्न भिन्न कर देते हैं और तुम्हें स्वार्थी करार देते हैं !
तुम न अच्छे प्रेमी हो और न ही अच्छे दोस्त !
तुम मेरा न तो मेरा प्रेमी बनकर साथ निभा पाये और न ही दोस्त बनकर साथ चल पाये !
पंक्षी भी जिस डाल का सहारा लेते हैं वे भी उसका साथ जल्दी नहीं छोडते और तुम खुद सोचो समझो अपनी आत्मा से सवाल पुछो क्या तुम वाकई सही हो ? क्या जो तुम कर रहे हो वो सही है ? मैं तुम्हें दोष नहीं दे रही हूँ शायद तुम्हारी फितरत ही यही हो ! क्रमश :

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