जब बहुत मुश्किल होने लगता है
तब लिखती हूँ एक प्रेम कविता
सुनो प्रिय, आकाश मे घिर आई है
काली बदली
जैसे मेरे जीवन की ख़्वाहिशों को
स्वार्थ ने स्पर्श कर लिया
और मिटा दिया मेरे तप पूजन आराधना को
दुनियाँ की समस्त खुशियों के बाद भी
कठिन होने लगा है अब जी पाना
अपनी ख़्वाहिशों के पंख कट जाने से
छटपटाहट भरा जीना आसान नहीं होता
यह मौन जो मेरे आसपास बिखरा है
बहुत अधिक कोलाहल से भर गया है
मैं अपनी आँख बंद करके
प्रतिपल तुम्हें देखते हुए
रख देती हूँ तुम्हारे कंधे पर अपना सर
और यकीन मानों
सम्पूर्ण पृकृति गुनगुना उठती है
सुमधुर गीत
कि भादों माह ने रख दिया है युवा कदम
मेरी अनेकों ख़्वाहिशों पर !!
@सीमा असीम   

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