इंतज़ार रब का

मंदिर की लाइन में खड़ी

करती रही इंतजार देर तक

अपने रब को पूजने के लिए

हाथों में पूजा की थाली पकड़े

थकन छाती रही

चेहरे का मीठापन घुला

खारा खारा सा हो उठा सबकुछ

घंटियों की घनन घनन से मिट जाता मन का गुबार

एक लोटा जल शिव लिंग पर चढाने को

इतना लम्बा इंतजार

मन में ही बसी है तेरी मूरत

दिन रात पूजती हूँ तुझे ही

क्यों करूँ फिर इंतजार

उस रब का 

जब मन में ही बसते हैं मेरे रब

रहते हैं मेरे आसपास !!

सीमा असीम 

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