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    मन 
    यह जो मेरा मन है न
    पृथ्वी सा बन गया है
    घूमता रहता है
    तुम्हारे इर्द गिर्द 
    अटका रहता है तुम में, हाथ मे हाथ डाले
    ऊँची ऊँची उड़ाने लेता हुआ
    उस पवित्र उच्च शिखर पर
    विराजित हो गया है
    हमारा प्रेम
    जिसे अब किसी अन्य फ्रेम में
    नहीं लगाया जा सकता
    अगर कोशिश की तोड़ने की




    या किसी अन्य फ़्रेम में लगाने की तो
    उसके काँच की किरचें टूट कर चुभेगी नहीं
    बल्कि टूटने से पहले दम तोड़ देंगी
    ये रुकी रुकी सी अधूरी साँसें ! !
    @सीमा असीम 

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