मैं जीना चाहती हूँ 

पलकें झुक जाती हैं

साँसे उच्छवासित हैं

धड़कने गुनगुनाती हैं

उठ जाते हैं हाथ दुआओं में

औ सारा आकाश मुट्ठी मे सिमट आता है

बस यूं ही तो व्यतीत हो जाता है

दिन रात

अहसास ही कब होता है

कैसे गुजरे दिन या रात




कभी कभी 

जी चाहता है नंगे पाँव रेगिस्तान की

तपती रेत पर दौड़ती चली जाऊँ

या समुन्द्र की ठंडी रेत पर

औंधे मुंह गिर जाऊँ

ज़ोर से आवाज लगाऊँ

पर मन को समझाते हुए कर लेती हूँ

कस कर अपनी आंखे बंद

और तुम्हें अपने सामने खड़ा पाकर

मेरा मन उमंगों से भर जाता है

आकाश मे लिखने को आतुर हो जाता है

अपने प्रेम को



सुनो प्रिय

मैं तो अभी जीना चाहती हूँ

तुम्हारी आँखों से 

दुनियाँ को देखना चाहती हूँ 

क्या तुम नहीं समझते 

मेरे मन की मौन भाषा  !!

 @सीमा असीम 

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