मुक्तक 

मौसमों से अब तुम्हारा हाल पूंछ लेते हैं
चाँद तारों से ठिठक के बात कर लेते हैं
चाहती हूँ ख़ुशी तेरी पर हूँ मजबूर बहुत
धड़का जो दिल, झुकके नमन कर लेते हैं
  


जीवन कठिन है या तो मुझे जीना न आया
उतर गयी बीच नदी में पर तैरना न आया
डूब गयी हूँ इस कदर मैं गहराई में आकर
कितना करूँ इंतजार अभी किनारा न आया



तुम सागर हो मैं रेत का कतरा ही सही
मिटा लुंगी पी कर खुद को जहर ही सही 
न करुँगी कभी शिकवा शिकायत तुमसे
ढूँढना न गर नजर कहीं मैं आऊँ नही



कैसी पड़ती तन पे नन्हीं नन्हीं बूंदें हैं
मन रोता और हंसती पट पट बूंदें हैं
इससे अच्छा न होती ये बरसात कभी
कितना गम दे जाती ये नन्हीं बूंदें हैं

@सीमा असीम 

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