पुकार तुम्हारी
ये जो तुम ज़ोर से आवाज
देकर मुझे पुकारते हो
कि बहुत व्याकुल हूँ
उदास भी बहुत हूँ
अब इंतजार है तुम्हारा
देख रहा हूँ राह तुम्हारे
आने की
पर सुनो प्रिय
प्रेम को दिखावा कहाँ
अच्छा लगता है
प्रेम को शब्दों की जरूरत
कहाँ होती है
कहाँ जरूरत होती है किसी
भाषा या अलंकारों की
पढ़ना ही है तो लो पढ़ लो
मेरी आंखों की कविता
बहुत उलझ लिया दुनियाँ के
जंजालों मे
अब मैं जीना चाहता हूँ
तुम्हारे साथ साथ वही सुखद
पल
हाथ मे हाथ डाले
अस्ताचल में समाते सूर्य
के साथ साथ
दौड़ना चाहता हूँ
समुंदर की गीली रेत पर
नम आँखों की ये पुकार मुझ
तक आ गयी है प्रिय
मैं मुस्कुरा दी हूँ
गुनगुना उठी हूँ
वो सुमधुर गीत जो तुमने
सुनाया था
मेरे सर को अपने कंधे पर
रखकर
अपनी उँगलियों की थाप मेरे
बालों मे देते हुए !!
सीमा असीम

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